Thursday, September 10, 2015

सौ सुनार की...

पीहू अगले महीने तीन साल की हो जाएगी. उसकी दो बातें मुझे बहुत पसंद हैं – उसकी आवाज़ और उसका firmness. जो भी उससे मिलता है उसकी हाज़िरजवाबी का क़ायल हो जाता है!
आज सुबह से घर में बहुत भाग-दौड़ हो रही है. पीहू को स्कूल के लिए तैयार करना है. पीहू भी दौड़ रही है और माँ- पापा भी! आख़िर पीहू पकड़ में आ ही गई. पापा ने बहुत प्यार से उसे गोद में उठाया.
फिर उससे भी दुगुने प्यार से उससे पूछा, ‘पीहू बेटा आज स्कूल जाएगी न?’
‘नईं !’
‘अरे! स्कूल तो इत्ता अच्छा है, वहां इत्ते अच्छे दोस्त हैं पीहू के. जाएगी न!’
‘नईं’ !
अब माँ की बारी.
‘अरे! दो दिन कित्ता मज़ा आया. आज भी देखना ख़ूब मज़ा आएगा.’
‘नईं जाएगी.’  
पीहू ने अपना फ़रमान सुना तो दिया था मगर दो बड़ों के आगे नन्ही पीहू की एक न चली. उसे तैयार करा ही दिया गया. माँ-पापा के खिले चेहरों का आप अंदाज़ा लगा सकते हैं!
स्कूल भेजने के पहले माँ की आख़िरी बात- ‘ये रहा पीहू की शर्ट पर रुमाल. मम्मा ने पिन से लगा दिया. अब ये रुमाल कैसे गिरेगा भई!  नोज़ी आएगी तो पीहू इससे झट पोछ लेगी’.
सन्नाटा!
और फिर सन्नाटे को चीरती पीहू की पाटदार आवाज़-‘ पीऊ इससे अपना आँसू पोंछ लेगी’!

अगली सुबह भी पिछली सुबह से बहुत अलग नहीं थी.
‘पीहू बाबा स्कूल जाएगी न!’
‘नईं .’
‘अरे! कल भी तो मना कर रही थी. गई तो मज़ा आया न!  आज भी आएगा. चलो भई जल्दी तैयार हो जाओ. आज तो पापा छोड़ के आएगा.’
चुप्पी!
फिर पालथी मारते हुए एक आदेश, ‘मेरा ‘नो’( नोबिता ) लगा दो.’
माँ ने घड़ी देखी और मोर्चा संभाला. ‘ नोबिता अभी कहाँ? वो तो स्कूल जाता है. वो सुबह उठा. ब्रश किया. नहाया. नाश्ता किया. दूध पिया और स्कूल चला गया.’
सन्नाटा!
फिर सन्नाटे को चीरती पीहू की आवाज़-‘ डोरेमोन स्कूल नईं जाता. वो घर में रहता है. टी वी चला दो.’

हर सुबह की भागदौड़ अब मानो रूटीन है... पर शुरुआत ऐसे नहीं हुई थी. स्कूल के पहले दिन स्कूल पहुँचते ही पीहू ने दिल खोल कर माँ-पापा को ‘थैंक यू’ कहा था. माँ-पापा गदगद थे! पर...

1 comment:

  1. पीहू है ही ऐसी कि जो एक बार मिले भूल नहीं पाता! मेरे पास भी उनके बहुत से किस्से हैं, जैसे लंदन में मेरी माँ को एक घर देने का वादा!
    बहुत बहुत प्यार!

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