Friday, September 25, 2015

दादाजी का ख़स्सी

बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल के एक फ्लैट में एक बूढ़े से दादा अकेले रहते हैं. उमर अस्सी के पार, लंबी-चौड़ी कद-काठी, आँखों पर ख़ूब मोटे फ्रेम का चश्मा, एक हाथ में छड़ी, एक में मोटी घड़ी और आवाज़ इन सभी कमज़ोरियों को पार करती हुई एकदम भारी! उनका ‘एएएSSSSSS.’ सब पहचानते हैं. जब कभी उनके ‘एएएSSSSSS.’  बोलने की आवाज़ आती हम सब समझ जाते कि कुछ गड़बड़ है. या तो वो लिफ्ट का कुछ देर से इंतज़ार कर रहे हैं या बच्चे उनके चलने के रास्ते में कब्बड्डी खेल रहे हैं. या फिर वो नीचे आ चुके हैं और ड्राईवर नदारद है. इसके अलावा बेबात का नाराज़ होते उन्हें कभी देखा नहीं. ना ही बिल्डिंग में कभी किसी से उलझते देखा.

दूसरी तरफ़ हैं बच्चे... उस्तादों के उस्ताद! उमर- साढ़े चार से साढ़े छह के बीच, आँखों में शरारत का नूर, फुर्ती – ऐसे तो खरगोश और हिरण वाली मगर आपातकाल में चीते वाली, आवाज़ में खनक और रौब शाहों का!

बक़रीद आई, घर-घर ख़स्सी आने लगे. परब के हफ़्ता-दस दिन पहले उन दादाजी के यहाँ भी ख़स्सी आ गया. ख़स्सी उन्होंने नीचे पार्किंग के गलियारे में बंधवा दिया. ख़स्सी नीचे और दादाजी तीसरे महले पर टंगे हुए. बच्चों की तो मानो लाटरी लग गयी. वे उसका ख़ूब ख़याल रखते. ख़ूब... माने ख़ूब!

उसे दिन भर पत्ते खिलाते- कभी अमरूद, कभी अनार, कभी हरसिंगार, कभी नीम... यानी उसे जितनी भी variety के पत्ते  हो सकते थे, खिलाते. जैसे-जैसे बक़रीद नज़दीक आती जाती बच्चों का ख़स्सी के लिए प्यार भी बढ़ता जाता और साथ ही बढ़ जाता खाने का varietyपन. कोई अपने घर से आटा लाता, कोई चावल, कोई चने की दाल, कोई pop-corn, आलू–प्याज़ जो भी मिलता, वे ले आते. कोई छुपा कर लाता, कोई अपना हक़ समझ कर लाता, तो कोई ख़स्सी का हक़ समझ कर लाता... लाना ज़रूरी था अब चाहे जैसे आए. सब कुछ ख़स्सी के सामने पेश किया जाता. ख़स्सी भी सब कुछ चखने से चूकता नहीं, मगर हाँ, अमरुद के पत्ते बड़े चाव से खाता.

एक दिन एक बच्चा coca cola ले आया. दूसरा कहाँ कम था. वो ‘Kurkure’ ले आया. बच्चों ने चीख़ा-चिल्ली शुरू की....उन्हें देख ऐसा लग रहा था मानो वे ख़स्सी के साथ पार्टी मनाने निकले हों. साथ में चल रही थी मैंsss  मैंsss  की जुगलबंदी!

जल्दी ही बिल्डिंग की बालकोनियों से बच्चों को डांटने की होड़ लग गई. किसी की माँ डांट रही थी, किसी की बहन, किसी का भाई, किसी की बुआ... चिल्ल-पों मची थी...

बच्चे भी चतुर खिलाड़ी थे. कुछ देर को इधर-उधर हो लिए और फिर... दबे पाँव वापस अपने मिशन ‘ख़स्सी-ए-खिलान’ पर लग गए.

मगर कहते हैं न, बकरे की माँ कब तक  खैर मनाएगी! उस रोज़ दादा की गाड़ी बिल्डिंग में नहीं थी मगर दादा थे. शोर शराबा सुन माजरा जानने दादा भी अपनी बालकनी में पहुँचे. हर रोज़ की तरह बच्चे ख़स्सी पर अपना प्यार उड़ेल रहे थे...और तभी... तभी... तभी... बूढ़े दादा जी की नज़र पूरे तमाशे पर पड़ी. अस्सी बरस की पूरी ताक़त उन्होंने चिल्लाने में झोंक दी, वे गरजे – ‘ऐ SSSSSS...’

 बस! इतने में ही पूरी टीम की हवा निकल गई. सभी के सभी हवा हो गए. पर थोड़ी देर बाद फिर से ख़स्सी के चारों तरफ जमावड़ा लग गया. हाँ, पहले से थोड़ा ज़्यादा सतर्क.


(ये घटना 4-5 साल पुरानी है. दादाजी अब ख़स्सी अपने स्टोर रूम में बंधवाते हैं. अपनी सुरक्षा का ख़याल रखते हुए न तो मैंने दादाजी का नाम बताया है न ही किसी बच्चे का. क्षमाप्रार्थी हूँ)

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