उसे पहली बार एक वर्कशॉप में देखा था. सारे बड़े लोगों के बीच अकेला बच्चा वही
था. उसकी माँ वर्कशॉप की तैयारी में जुटी थी. और वो एक किनारे अपनी ड्राइंग कर रहा
था. अपने पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर की ड्राइंग बनाता, फिर उनके कुछ डायलॉग्स धीरे-धीरे
बोलता और मुस्कुराता. डायलॉग्स की जगह कुछ टेढ़े मेढ़े लाइन्स खींचता, कुछ अक्षर(
जितने वो जानता था) लिखता और फिर दूसरी ड्राइंग की तैयारी में लग जाता. माँ से बस
एक ही उम्मीद—मम्मा जहाँ भी बैठी हो बस उसकी ड्राइंग एक नज़र देख ले! ड्राइंग पूरी हो जाने पर उसे अपने हाथ में उठाता
और धीरे से कहता ‘ मम्मा! हो गया.’ मम्मा
के चेहरे पर मुस्कराहट! अपनी जगह से ही इशारा करती कि वो और बनाए. बच्चे
की न कोई और फ़रमाइश न कोई शरारत.
लंच का टाइम आया. दस्तरख़ान तरह तरह के पकवानों से पट गया. लेकिन माँ ने स्पेशल
डब्बा निकाला, जिसमें बच्चे
का स्पेशल खाना था—भिन्डी की भुजिया और पराठा.
पहले निवाले के साथ एक सवाल-‘ मम्मा, भिन्डी तुमने बनाई?’
‘नहीं बेटा, बीना आंटी ने बनाई.’ माँ ने जवाब दिया.
‘अच्छी है’. नन्हें दोस्त ने छोटा सा जवाब दिया. थोड़ी देर में खाना ख़त्म. माँ
के चेहरे की मुस्कुराहट बढ़ गई और उसने भी इत्मीनान से खाना खाया. पहली मुलाकात
इतनी ही भर थी.
इत्तेफ़ाक से दूसरी मुलाकात भी उससे एक वर्कशॉप के दौरान ही हुई. मैंने उसे देखते ही मुस्कुराकर कहा- ‘हलो
आयु’. मैंने उसकी माँ को यही बुलाते सुना था सो मैंने इसी नाम से उसे पुकारा.
‘आप मुझे आयुष्मान बुलाइए. बाहर मुझे आयुष्मान बुलाते हैं और घर पर आयु!’ उसने स्पष्ट शब्दों में कहा. उसकी आवाज़ न कड़क थी
न नाराज़! एकदम firm थी.
‘ओह...हाँ... सॉरी!’. पांच साल के आयुष्मान का जवाब सुन सकपकाकर यही तीन
अल्फ़ाज़ उस वक़्त मेरे मुँह से निकले थे. उस दिन जब तक हमलोग साथ रहे मैंने उसे
आयुष्मान ही बुलाया.
उस दिन आयु से मैंने कुछ सीखा था.
हममें से ज़्यादातर के दो-तीन नाम होते हैं. घर का नाम और बाहर का नाम मिलाकर
कुछेक के तो दर्ज़न में होते हैं. कई बार हमारे नाम में आ, वा, ऊ या रे मिलाकर या
नाम को काट-छांट कर नया नाम बना दिया जाता है. अक्सर हमारे व्यवहार या शरीर को
देखकर भी नाम दिए जाते हैं. जो कई बार वक़्ती होते हैं और कई बार स्थाई... जैसे नकफोरण,
मकनी हाथी, काली मैया, गुस्सैल माई, करियट्ठा, नकभेंगना, चचा बतोलन, बी बतोलन,
लदभेसर, चना दास, टिंगू... वगैरह-वगैरह. कई बार ऐसे विशेषणों से जीवन भर हमारा
पीछा नहीं छूट पाता. ये साए की तरह हमसे चिपक जाते हैं. ये हम बन जाते हैं और हम
कहीं खो जाते हैं!
हालांकि ‘आयुष्मान’ को ‘आयु’ बुलाने में मेरा मक़सद चिढ़ाने का बिलकुल नहीं था,
लेकिन पांच साल के आयु...आयुष्मान का जवाब सुन उस दिन मुझे लगा था कि चिढ़ने की
बजाय अगर हमलोग छुटपन में ही सीधे सीधे अपनी बात कहना सीख लें तो हमारे नाम और
व्यक्तित्व के साथ खिलवाड़ नहीं होगा.
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