Friday, August 28, 2015

जब किताब ख़ुश हुई

सलोनी और सुहाना जुड़वाँ बहनें हैं. इनका हर वक़्त मुस्कुराता चेहरा इन्हें बाकी बच्चों से अलग कर देता है. घर आनेवाले सभी मेहमान इनके बारे में एक ही बात कहते हैं,’ कितनी शांत, कितनी सौम्य है!लेकिन...जब अकेली होती हैं तो इनकी चीख आप गली के पार भी सुन सकते हैं!

बात दो साल पहले की है. तब ये छह साल की थीं. एक दिन इनकी माँ, नेहा का फ़ोन मेरे पास आया. उसकी आवाज़ थोड़ी घबराई हुई थी. उसने पूछा,’ मुझे बताइए तो तोत्तो चानकिताब कहाँ मिल सकती है?’

सवाल सुनते ही मेरा माथा ठनका. अभी कुछ दिनों पहले ही मैंने उसे तोत्तो चानदी थी. देते वक़्त मैंने कुछ कड़ाई से ही उससे कहा था, ‘किताब का ख़याल रखिएगा.और नेहा ने बहुत भरोसा दिलाते हुए कहा था,’ निश्चिन्त रहिए. जिस हाल में ले जा रही हूँ वैसी ही वापस करुँगी.
किताब को कुछ हो गया हैकी आशंका लिए बड़ी मुश्किल से मैं पूछ पायी थी, ‘ मेरी तोत्तो चानतो तुम्हारे पास हैफिर क्यों चाहिए?’
इसीलिए तो चाहिए... मैं आपको कैसे बताऊँ आपकी किताब के साथ क्या हो गया है?’ नेहा ने झिझकते हुए कहा.
क्या हुआ?’ मेरी आवाज़ से मानो घबराहट बरस रही थी.
  उसे न सलोनी सुहाना ने थोड़ा रंग दिया है. मैं आपकी प्रति रख लूंगी. आपको नयी खरीदकर दे दूंगी.नेहा ने मुरझाई आवाज़ में कहा.
 मैंने भी बहुत मायूसी से पूछा,’ किताब पढ़ने लायक हालत में है कि नहीं?’.
हाँ-हाँ उसमें कोई दिक्कत नहीं.नेहा की आवाज़ में विश्वास बढ़ा था, मगर थोड़ा ही.

नेहा ने भले यह कह दिया था कि किताब पढ़ने की हालत में है मगर मुझे कोई उम्मीद न थी. गुस्सा, दुःख और अफ़सोस के भाव मन में एक साथ उमड़ पड़े थे. मैं मन ही मन बड़बड़ा रही थी,अब किताब किसी को नहीं दूँगी, कभी नहीं !’ आँखों से आंसू निकल पड़े थे.

 उसी शाम नेहा तोत्तो चानलेकर मेरे घर आयी. साथ में दोनों बच्चियां भी आयीं. सभी सहमे खड़े थे- वे भी और मैं भी. धड़कते दिल से मैंने किताब अपने हाथों में ली और उसे खोला. उसे देखने के बाद मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं अपनी क्या प्रतिक्रिया दूं!  आँखों के साथ मेरा मुँह भी खुला का खुला रह गया था . तोत्तो चानपूरी तरह से बदल चुकी थी.

इसका तो रंग रूप ही बदल गया!... वाह! शानदार!... कितनी सफ़ाई है इनके काम में! और ज़रा कलर स्कीम तो देखो!मैं ख़ुश होकर धाराप्रवाह बोले जा रही थी. मेरी प्रतिक्रिया सुन नेहा हँसने लगी. उसे हँसता देख सलोनी सुहाना भी हँसने लगीं. देखते ही देखते  माहौल बदल गया था.

काले और सफ़ेद चित्रों वाली मेरी किताब रंगीन चित्रों से भरी हुई थी. नेहा ने बताया कि किताब में रंग भरने के बाद वे ख़ूब ख़ुश होकर नेहा के पास दौड़ते हुए पहुंचीं और बोलीं कितनी उदास थी किताब ! अब देखिए, कितनी  ख़ुश लग रही है! और कितनी सुन्दर  भी दिख रही है!

 मैं उसकी बात सुन ख़ुश हो रही थी और मुझे पहली बार अपनी तोत्तो चानभी बहुत खुश दिखाई दे रही थी.

अगर आपकी किताब उदास है और आप अपनी किताब को ख़ुश देखना चाहते हैं तो आप फ़ौरन अपनी किताब सलोनी और सुहाना के हवाले कर दें! आपकी किताब भी ख़ुश हो जाएगी!

 मेरी ख़ुश किताब की एक झलक आपके लिए...



       



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