Thursday, August 6, 2015

मुरूगा आँटी


मेरी एक दोस्त है, मुरुगा. दरअसल उसका नाम है मुरुगाक्षी लेकिन हम सब उसे प्यार से मुरूगा बोलते हैं. एक ज़माने में हमारे यहाँ उसका काफ़ी आना जाना था. हमारी ज़िन्दगी उसके नाम से ही गुलज़ार थी.

फ़ोन की घंटी बजती, बड़ा बेटा फ़ोन उठाता और पुकारता—‘माँSSS मुरुगा आँटी का फ़ोन है’. मैं भाग कर आती. फ़ोन लेती और कहती-‘ हेलो...मुरुगा तेरा ही इंतज़ार कर रही थी.’ कभी घर की घंटी बजती, मैं दरवाज़ा खोलती और सामने अगर मुरुगा हो तो उसे देख ख़ुशी से कह उठती—‘आहा..मुरुगा जी सुस्वागतम!’ सब्ज़ी खरीदते कभी बाज़ार में बच्चे दिखाते—‘माँSSS मुरुगा आँटी’. बच्चे जन्मदिन की पार्टी की लिस्ट बनाते. मैं पूछती- ‘मुरुगा आँटी का नाम लिखा?’
कुल मिलाकर यह कि हमारे लिए मुरुगा आंटी का मतलब था Smile!

छोटा बेटा कार्तिक तब ढाई-तीन साल का था. कुछ वो खुद सीख रहा था, कुछ हम सिखा रहे थे. 

उन्हीं दिनों मैंने सोचा कि क्यों न इसे अब अक्षर, शब्द और किताबों से भी परिचय करा दिया जाए. जल्दी किताबें हाथ में आएंगी तो जल्दी उनसे दोस्ती भी होगी. मैंने एक रंगीन किताब ख़रीदी ABCD वाली. और एक दिन मैंने कार्तिक को अपने साथ बिठाया और शुभारंभ कर दिया- ‘कार्तिक देखो! ये है A, A for apple माने सेब’. सेब किताब में देख कार्तिक खुश हो गया. भाग कर गया और टेबल पर रखा सेब उठा लाया. उसके लिए ये अनोखी बात रही होगी कि जो उसके हाथ में है वही किताब में भी है. मैंने आगे बढाया,’ देखो! B, B for ball.’ इतना कहना था कि कार्तिक भागा और अपनी बॉल उठा लाया. वो ख़ूब खुश हो रहा था.  मैं आगे बढ़ी—‘C, C for cock याने मुर्गा’!

इतना सुनते ही कार्तिक के चेहरे का रंग उड़ गया. उसने दो तीन बार मुझे देखा फिर किताब और फिर बहुत सहम कर पूछा- ‘मुर्गा... मुर्गा आँटी?’ मानो उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि किताब में आकर उसकी आँटी बदलकर ऐसी कैसे हो गयीं? मैं चीखी – ‘अरे नहीं! ये मुर्गा है, माने चिकन, जिसे हम खाते हैं. रास्ते में कभी ज़िन्दा दिखेगा तो तुम्हें दिखाउंगी.’ कार्तिक ने तब तक मुर्गा देखा नहीं था.

उसने बहुत मासूमियत से पूछा- ‘मम्मा, मुर्गा आँटी तो मुर्गा नहीं हैं ना?’

‘किताब वाला मुर्गा मुर्गा यानी चिकन है और तुम्हारी आँटी का नाम मुरुगाक्षी है! हमलोग प्यार से उन्हें मुरुगा कहते हैं.’ मैंने उसे प्यार से समझाया.

कार्तिक ने इन शब्दों के बीच के बारीक अंतर को कितना समझा होगा नहीं मालूम. उसके लिए इतना ही समझना काफ़ी था कि उसकी आंटी किताब में आते ही बदल नहीं जातीं. 

आज सोचती हूँ तो लगता है कि हम सब देश के लोगों के बारे में कितना कम जानते हैं और जानने की कोशिश भी कहाँ करते हैं. और जो कुछ भी जानते हैं उन्हें अपने बच्चों तक बिना किसी bias के पहुँचाने की कोशिश नहीं करते.


(यह घटना मेरी एक सहेली शेफ़ाली ने साझा की है)

2 comments:

  1. badiya..enjoyed reading it..touching kk

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  2. Bahaut hei badiya tarike sey aap ney likha hai yeah lovely.

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