हमारी बालकनी से अपूर्वानंद जी की बालकनी बिल्कुल लगी हुई है. घर एक ही है बस
बीच में छह इंच की पतली दीवार है. हम तीसरी मंज़िल पर हैं और वे पहली मंज़िल पर.
आज सुबह साहिर ने पुकारा,’ ख़ालूSSSजा$$न’. ख़ालूजान भी जैसे बस उसकी आवाज़ सुनने
का इंतज़ार कर रहे हों. तुरंत बाहर निकले—‘हाँ बेटा’.
साहिर के हाथ में बांसुरी थी. उसे दिखाकर वो कहने लगा,’ बांसुरी को न कभी कभी
flute भी कहते हैं. हमको भईया लोगों ने बताया है’. ये कहकर वो बांसुरी बजाने लगा.
ख़ालूजान नन्हे साहिर को बांसुरी बजाते देख ख़ुश हो रहे थे. बोले, ‘तुम बहुत
अच्छी बांसुरी बजाते हो साहिर’
साहिर ने हैरान होकर पूछा- ‘आपके यहाँ आवाज़ चली गयी?’
‘हाँ, घर के अन्दर तक आवाज़ चली गई’, ख़ालूजान ने चश्मे के अन्दर से अपनी आँखे
बड़ी करते हुए कहा.’ ये तो तुमने कमाल कर दिया.’
इस बात से साहिर बहुत ख़ुश हो गया और झूमते हुए उसने एक नयी बात बताई, ‘शिउली न
हमको साइकिल पर बिठा कर कबूतर दिखाने ले गयी थी’.
‘कब ले गयी थी?’- उन्होंने पूछा.
साहिर ने कहा, ‘कल’.
‘कल ?’...ख़ालूजान सोचने लगे. उनकी भवें, नाक और चश्मा सब सोच में पड़ गए.
उनका काम आसान करते हुए मैंने उन्हें बताया, ‘साहिर हर पीछे की बात को कल
बोलता है. चार महीने पहले जब हमलोग यहाँ शिफ्ट हुए थे तब शिउली उसे साइकिल पर
बिठाकर कबूतर दिखाने ले गयी थी. उसी के बारे में बता रहा है’.
सुनकर साहिर ने जैसे कुछ समझा और बोला,’ हाँSSS जब हमलोग यहाँ शुरू हुए थे
तब.’
(06.02.2009, बात तबकी है जब साहिर साढ़े तीन साल का था)
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