बात तब की है जब सोना करीब डेढ़ साल की थी. मैंने सोना के जन्म के बाद ऑफिस से
लम्बी छुट्टी ली थी. अक्सर ऑफिस से मेरे कॉलीग्स और फ्रेंड्स के फ़ोन आते रहते थे. उनमें
से कई लोग फ़ोन पर सोना से बात भी करना चाहते थे. नन्हीं सोना की तोतली बातें सुनकर
उन सब को बड़ा मज़ा आता था. सिर्फ़ उन्हें ही नहीं सोना को भी उनसे बात करके मज़ा आता
था. फ़ोन की घंटी बजते ही सोना जहाँ भी होती भागती हुई आती और फ़ोन मांगने लगती... ’
सोना बात कलेगी... डे डो... डे डो...’ और ऊपर से एक जादुई चीज़ मोबाइल...कोई बोल तो
रहा है पर दिख नहीं रहा ... छोटी सी डिबिया और तरह-तरह की आवाजें!
हम सब को इस तरह की बातचीत में मज़ा आता था. कई बार तो सोना के हाथ बढ़ाने से
पहले मैं ख़ुद ही उसे अपना मोबाइल दे देती.
उन दिनों कई बार कंसल्टेंट्स और कई कंपनी से जॉब के लिए फ़ोन भी आते रहते थे.
अक्सर मैं उन लोगों से बात करते हुए कहती थी,’ एक्चुअली, आई ऍम नॉट वर्किंग राईट
नाउ’. ऐसे में सोना अगर बात करने के लिए ज़िद करती तो मैं इशारे से उसे मना कर देती.
किसी तरह उसे फुसला लेती.
एक दिन ऐसे ही एक फ़ोन कॉल आने पर सोना मचल गई” मुझे भी एक्चुअली अंकल से बात
करनी है... सोना को डो ना, सोना एक्चुअली अंकल से बात कलेगी...” फिर तो वो ‘एक्चुअली
अंकल’ ‘एक्चुअली अंकल’ बोल के रोने लगी. मैं परेशान कि वो कहना क्या चाह रही है!
थोड़ी देर बाद समझ में आया कि सोना के लिए एक्चुअली किसी का नाम था जिसे मैं
बात करते हुए एड्रेस करती थी. मैं हंसी से लोट-पोट हुई जा रही थी और सोना हैरान-परेशान
मुझे देख रही थी.
( यह घटना मेरी एक सहेली ने साझा की है)
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