Saturday, September 19, 2015

‘जय हे’...हुssआ


दो गलियां हैं. समानांतर. एक में आदित्य का घर है, दूसरे में उसका स्कूल है. घर और स्कूल बिलकुल आसपास. कितना अच्छा है!  माँ- बाप के लिए तो बहुत ही अच्छा है. न उन्हें ख़ुद जल्दी उठना है न बच्चे को उठाना है. स्कूल ऐसे ही हुआ करें! घर के एकदम पास. फिर जीवन में सुख की अनंत धारा बहा करे...

आदित्य... थोड़ी-थोड़ी गिलहरी की तरह आँखें, आवाज़ थोड़ी भारी और अंदाज़ ‘ख़ामोशी भरा’. चौथी क्लास में है. वैसे उससे जान-पहचान पुरानी है पर समझना अभी शुरू हुआ है... समर कैंप के दौरान कुछ बच्चों में झगड़ा हुआ. वे चीखते चिल्लाते एक दूसरे पर आरोप लगा रहे थे...’ तुमने किया. तुम्हीं ने किया. तुम्हारे अलावा कोई कर ही नहीं सकता.’ मगर आदित्य उन बच्चों में शामिल नहीं था. वो दूर मासूम चेहरा लिए बैठा था. दरअसल, चिकोटी उसी ने काटी थी.

तो ऐसा है हमारा आदित्य, ‘छुपा रुस्तम’!

आदित्य के स्कूल की घंटी सुबह 8.15 बजे बजती है. आजकल जहाँ बच्चों को ढोनेवाली गाड़ियाँ पांच-साढ़े पांच बजे से एक दूसरे से race लगाने लग जाती हैं वहाँ स्कूल का ऐसा समय होना किसी चमत्कार से कम न कहा जाएगा. ऊपरवाले की कृपा, ख़ुदा की नेमत, रब दी मेहर, ईसा का प्रेम... इससे कम बिलकुल नहीं!  

आदित्य इस तोहफ़े का पूरा सम्मान करता है. हर काम पूरे इत्मिनान से करता है. उठना, ब्रश करना, नहाना, स्कूल के कपड़े और जूते पहनना... हर काम धीमी गति के समाचार की तरह होता है. मगर आप ये न समझें कि वो टाइम पर तैयार नहीं होता है. वो घंटी बजने के पहले तैयार हो चुका होता है. टी वी के सामने बैठा पराठा और भुजिया का एक- एक निवाला रस ले ले कर खा रहा होता है.

उस वक़्त माँ दरवाज़े पर खड़ी कह रही होती है ‘ गोलू भी निकल गया. मुन्ना भी चला गया. जल्दी खा ले बाबू.’

आदित्य से जवाब नहीं एक सवाल मिलता है ’ हुssआ?’

‘नss अभी अंग्रेजिये वाला हो रहा है.’ माँ बताती है.

आदित्य टी वी की आवाज़ कम करता है और कान दीवार में सटाता है. ‘हाँ अभी अंग्रेजिये वाला प्रेयर हो रहा है.’

माँ को पुत्र-निर्देश है कि वो दरवाज़े पर खड़ी रहे और अगर उसका कोई दोस्त उसके बारे में पूछे तो कह दे कि बस अभी तो बईठबे किया है नाश्ता करने. बस खतम होते चला जाएगा.

पराठे के आख़िरी दो कौर हैं. उनके 20 टुकड़े किये जा चुके हैं. अब भुजिया का सहारा लेकर पराठे के पिद्दी टुकड़े को उठाकर धीरे- धीरे मुँह में डाल रहा है. कुछ मिनट बाद माँ से फिर वही सवाल...’ हुssआ?’

‘हाँss ‘जन गण मन’ शुरू हो गयाss.’ माँ बताती है.

आदित्य के चेहरे पर इत्मिनान भरी  मुस्कराहट है.

बहुत ही जल्द माँ के ज़ोर से बोलने की आवाज़, ‘ जय हे हो गया, जय हे हो गया बउआ.’

‘जय हे  हो गया, अब भागोsss...’ वो बैग का भारी बोझा पीठ पर लादे स्कूल की और दौड़ जाता है.

माँ पूछती है कि वो स्कूल की प्रार्थना में क्यों नहीं शामिल होता तो गुरु गंभीर स्वर में कहता है... ‘रोज रोज वही प्रेयर होता है. कै बार एक्के प्रेयर करें?’


और मैं सोच रही हूँ, दो समानांतर गलियां हैं. समानांतर... इनमें मिलन कैसे संभव है!

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