Friday, August 21, 2015

अच्छा पॉटी

अभी हमलोग जहाँ रह रहे हैं उसके पास दो-तीन पार्क हैं. गर्मी बहुत है, सो नींद जल्दी टूट जाती है. ऐसे में हम दोनों साहिर को लेकर पार्क निकल जाते हैं. थोड़ी देर तक तो वो हमारा हाथ पकड़ कर चलता है फिर हाथ छुड़ाकर कभी किसी बच्चे के पास तो कभी चारदीवारी पे दौड़ती गिलहरियों के पीछे भागता है... छोटे छोटे वाक्य में अपनी बात कहता है... ओ गिलहरी आ जा..भू भू आया है...बाबा अच्छा है...बाबू अच्छा है...

एक दिन पार्क से लौटकर उसका जूता उतारने के लिए उसे एक कुर्सी पर बिठाया. उसने एक कहानी सुनानी शुरू कर दी...’हमलोग पार्क गए थे. वहां बिल्ली थी. भू भू था. हमलोग खेलने लगे. वहां न गंदा पॉटी था. बाबू  के जूते में लग गया. फिर मम्मा घर लाई. जूता साफ़ की.’ फिर वो ख़ूब ख़ुश होकर अपने पैर हिलाकर कहने लगा ‘ फिर हमलोग दूसरे पार्क गए. अच्छे वाले पार्क. वहां बिल्ली थी. वहां भू भू था. वहां अच्छा पॉटी था.’

साहिर की यह बात सुनते ही मेरी भवों पर बल पड़े. जैसे उसने मेरा चेहरा पढ़ लिया हो और यक़ीन दिलाने के लिए फिर से बोला, ’ हाँ मम्मा अच्छा पॉटी था.’

मेरी भवों पर फिर से बल पड़े और उसने फिर से ज़ोर देकर कहा ‘ अच्छा पॉटी था मम्मा!’  इस बार उसने थाSSS पर बहुत ज़ोर दिया.

कहानी आगे सुनने के लिए मैंने उससे पूछा, ’ अच्छा फिर ?'

बहुत ख़ुश होकर उसने कहा, ’ बाबू के जूते में नहींSSS लगा ! अच्छा पॉटी था मम्मा!’

ये बोल कर वो अपने दोनों पैर ज़ोर-ज़ोर  से हिलाने लगा.

( 24.05.08)


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