शायद
पहली बार इतने छोटे बच्चों को पढ़ाया था. पहली क्लास के बच्चे थे.
छोटे
बच्चे कितने मासूम होते हैं न! भला इन्हें पढ़ाने में क्या मुश्किल! यही ख़याल मन
में लिए थिरकते क़दमों से मैं क्लास की तरफ़ बढ़ी. क्लास के बाहर ही उनके चीखने की
आवाज़ें आ रही थीं. ‘इsss’ ‘इsss’ की आवाज़ एकदम निखर कर बाहर आ रही थी. बाकी
आवाज़ें कमज़ोर थीं इसलिए उनके बारे में मैं दावे के साथ कुछ नहीं कह सकती.
अंदर
घुसने पर पता चला कि वहाँ कुछ 24-25 बच्चे थे जो तीन ग्रुप में बंटे हुए थे. एक
ग्रुप में कुछ बच्चे दनादन एक-दूसरे की ठुकाई में लगे थे. दूसरी तरफ़ एक नाज़ुक-सा
बच्चा लगातार रोए जा रहा था. किसी ने उसका स्टिकर ले लिया था. वो पूरी ताक़त लगाकर रो
रहा था, ‘मैम इसने ले लिया. मेरा ले लिया.’ उसकी आवाज़ इतनी महीन थी कि कई बार
सुनने के बाद समझ में आया कि आख़िर वह कह क्या रहा है. बीच वाले ग्रुप में कई
लड़कियां थीं जो मज़े में गप्पे लड़ा रही थीं. उन्होंने मेरे घुसने पर ध्यान दिया और
बाक़ायदा गा कर मेरा स्वागत किया – ‘गुड मॉर्निंग मैsssम’. इस रस्म-अदायगी
के बाद वे पूरी तन्मयता से अपने पहले वाले काम में लग गईं. लड़के तो बदस्तूर अपने
कामों में मशगूल ही रहे.
मैंने
सबका ध्यान खींचने के लिए ज़ोर से ताली बजाई. ताली की आवाज़ उनके शोर में कहीं खो
गई. मैंने दुबारा कोशिश की. नतीजा...मैं ताली बजाती रही वे अपने काम में मगन रहे.
प्रिंसिपल
मैम के कमरे तक उनका शोर पहुँच चुका था. वे आईं और पूरी ताक़त से बच्चों पर गरजीं. एकाएक
सन्नाटा छा गया. उनको गए मुश्किल से दो मिनट हुए होंगे कि क्लास में फिर से उत्सव
का माहौल छा गया.
इस
बार मैंने एक खेल के ज़रिए उनका ध्यान खींचने की कोशिश की. ‘बाटू-बाटू’ का खेल
बच्चों को मज़ेदार लगा. लगभग सभी उस खेल में जुड़े. लेकिन थोड़ी देर में ही उस खेल से
उनका मन भर गया.
मेरी
घबराहट बढ़ रही थी, ‘अब?’ ऊपर से नई परेशानी! क्लास में दो बच्चों की बोतल से सारा
पानी ज़मीन पर बह गया था. कुछ बच्चे मुझे इसकी सूचना दे रहे थे. इतने में ‘स्टिकर’
वाला बच्चा फिर से रोने लगा. एक बोतल उसकी भी थी. तभी एक लड़की भी रोने लगी. उसकी
सहेलियों ने बताया कि उसके पेट में बहुत दर्द है.
मेरी
समझ में कुछ नहीं आ रहा था. मैंने एक बच्चे को बुलाया और कहा, ‘जाओ, जाकर दीदी को
बुलाओ. इसे प्रिंसिपल रूम में ले जाना होगा.’ इसे सुनते ही विवान, जो पीछे की बेंच
पर बैठा था, दीदी को बुलाने भाग लिया.
उधर
पानी का मामला बाक़ी था. दीदी ने देख लिया था कि पानी गिरा है सो उन्होंने वहाँ
सफ़ाई करा दी. अचानक कुछ और लड़कियों के पेट में दर्द शुरू हो गया. मेरे मुँह से यही
निकला, ‘जाइए, दीदी को बुलाइए और आप भी प्रिंसिपल मैम के कमरे में जाइए.’
लड़कियां
एकदम से चुप! मैंने पूछा, ‘क्या हुआ?’ उनमें से एक बोली, ‘ मैम हम थोड़ी देर यहीं
पर head down करते हैं.’ मैंने कहा, ‘ठीक है.’
अब
तक पहली वाली जिसके पेट में ‘सच’ में बहुत दर्द हो रहा था वापस आ गई थी. उसके पेट
और चेहरे दोनों जगह से दर्द भाग गया था. फिर बाक़ी समय उसने अच्छे से काम किया.
इतने
में घंटी बज गई और बच्चे चिल्लाए, ‘मैम क्लास ओवर.’
मेरे
लिए ये किसी परीक्षा से कम नहीं था. मैंने कहा, ‘कोई बात नहीं. अब हम हिन्दी
पढ़ेंगे.’ मेरा इतना कहना था कि बच्चे चिल्लाए, ‘मैsssम, हम कविता सुनाएंगे.’
एक
बच्चे ने अपना हाथ उठाया और हाथ उठाए मेरी ओर भागता आया. उसके पीछे कई बच्चे दौड़े
आए. सभी कविता सुनाना चाहते थे. कोई ‘नन्हा पौधा’ सुनाना चाहता था तो कोई ‘हाथी
राजा’ तो कोई कुछ और. बोर्ड के पास बच्चों का हुजूम लगा था.
पल
भर को मुझे लगा अब बहार आएगी. एक के बाद एक सब मुझे कविताएँ सुनाएँगे और मैं मज़े
लूँगी. देखते ही देखते वहाँ धक्का-मुक्की शुरू हो गई. सबसे पहले कौन सुनाएगा झगड़ा
इस पर शुरू हुआ. बीच-बीच में ‘मैsssम’ ‘मैsssम’ की आवाज़.
समाधान
के तौर पर मैंने उन बच्चों को थोड़ी-थोड़ी दूरी पर खड़ा किया. विवान ने मुझसे चहकते
हुए पूछा, ‘मैम, क्या ये हमारी पनिशमेंट है?’ जब तक मैं उसे कहती ‘नहीं’ एक लड़का
मेरे सामने खड़ा हो चुका था. उसे ‘सू-सू’ आई थी. वो पहले भी 3-4 बार ‘सू-सू’ के लिए
जा चुका था. मैंने सख्ती दिखाते हुए उसे मना कर दिया. उसने अपने पैरों को क्रॉस
किया और एकदम रुंआसा होकर हाथ जोड़ते हुए बोला, ‘मैsssम, यहीं पर हो जाएगा मैsssम.’
मैंने उसे जाने दिया.
उसके
जाते ही कुछ और बच्चों को बहुत ज़ोर से सूसू आई. मैंने सबको जाने दिया.
कविता
सुनाने वाले बच्चों ने पूरे हाव-भाव के साथ कविता सुनाई. कविता के बाद मैंने कहा.
‘चलो अब थोड़ा dictation लेते हैं. छह-सात बच्चों को छोड़ कर सभी dictation लेने
लगे. लंच ब्रेक होने पर सभी ने अपनी कॉपी मेरे पास जमा कर दी. थोड़ी-बहुत ग़लतियां
होने पर भी मैं सबको ‘smiling face’ वाले स्टार्स दे रही थी. हर ‘स्टार’ का shape
अलग था. किसी का oval, किसी का triangle तो किसी का square. किसी में लम्बी चुटिया
बना देती तो किसी को जूते पहना देती. ये सभी हँसते-मुस्कुराते ‘स्टार’ थे. इन्हें
देख बच्चे भी ख़ूब ख़ुश हो रहे थे.
विवान
ने अपनी कॉपी पहले जमा नहीं की थी. बच्चों के ‘स्टार देख वो भी अपनी कॉपी ले आया.
उसने सारे शब्द रोमन में लिखे थे. जैसे धूल के लिए dhool, फूल के लिए phool, नदी
के लिए nadi. वो मुस्कुराता हुआ मेरे सामने खड़ा था. मैं एक बार उसे देखती एक बार
उसकी कॉपी को. मैंने उसे भी ‘स्टार’ दिया और कहा,’ अगली बार हिन्दी बोलने पर
हिन्दी में ही लिखना.’ सुनते ही वह मुस्कुराया और फिर बाक़ी बच्चों के ऊपर गरजा,
‘मैम अभी यही हैं और तुम सब हल्ला कर रहे हो?,’ देखते ही देखते वह बोर्ड पर कुछ
बच्चों के नाम लिखने लगा. फिर बोला,’ हल्ला करने वालों का नाम प्रिंसिपल मैम को पहुंचा
दिया जाएगा.’
मैंने
उसे समझाबुझा कर उसकी सीट पर वापस भेजा. इतने में घंटी बज गई. बाक़ी के पीरियड में
15 अगस्त के कार्यक्रम की तैयारी होनी थी. बच्चे अब खुल कर शोर कर रहे थे और मैं
इस शोर से ज़रा भी परेशान नहीं हो रही थी.
विवान
का पूरा दिन मस्ती में बीता. कभी उसने मेरी तरफ़ से बच्चों को चुप होने का आदेश दिया तो
कभी मेरे कहे बिना दीदी को बुलाने भागा. बच्चों के बीच झगड़ा होने पर ख़ुद से ही पंच
की भूमिका निभाता रहा. पानी कहाँ गिरा है, कहाँ किसकी पेंसिल गिर गई है, किसकी
नोटबुक घर में छूट गई है यह सब मुझे बताता रहा. स्कूल को अपना ही घर समझ कई बार अंदर-बाहर के चक्कर लगाता रहा. और तो
और हिन्दी के शब्द अंग्रेज़ी में लिखता रहा.
छुट्टी
होने पर विवान मेरे पास आया और बोला, ‘आप अच्छा पढ़ा लेती हैं मैम.’ मैं उसे हक्की
बक्की भौंचक्की होकर देखती रही. काश उसने यही बात लिख कर दी होती, मेरे पास एक
सर्टिफिकेट होता... एक स्टूडेंट का सर्टिफिकेट एक टीचर के लिए...!
(बात
अगस्त 2012 की है. साहिर के स्कूल की हिन्दी टीचर छुट्टी पर जा रही थीं. उन्होंने
मुझसे आग्रह किया कि हफ़्ते भर मैं उनकी जगह पर पढ़ा दूँ. एक दिन पहली क्लास की टीचर
भी छुट्टी पर थीं. उस दिन मुझे उनके क्लास में भेजा गया था.)
waah!!!!!!
ReplyDeletetoo interesting swati!
i wish teachers aapke jaisi hoti to kya baat!!!!
Have you ever thought about taking this up!!! on a serious note!!!
are.... waah...
ReplyDeleteteacher.. hona sachme ek bahut patience ka kam hai...
sach me bachhon ko padhaana wo bhi 30 bachhon ko ek saath!! bahut sundar Swati.. yahi sachh hai... teachrs ka.
So well conveyed! As teachers, our real reward lies in students' smile n appreciation...😊😊😊
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