कुछ
चार-पांच साल पहले मैंने मौल्ला के बारे में पढ़ा था. मौल्ला का नाम और जीवन इतना
शानदार लगा कि मैं जिससे भी मिलती उसे उनके बारे में ज़रुर बताती. एक दिन साहिर को
मौल्ला के जीवन का वह हिस्सा बताया जिसमें मौल्ला ने तेनालीराम के अहंकार को
तोड़ने के लिए पाँच दिनों में नए सिरे से रामायण लिख डाली. उनकी लिखी रामायण को
‘मौल्ला रामायणम’ के नाम से जानते हैं.
‘मौल्ला
रामायणम’ सीता के नज़रिए से लिखी गई है. इसमें सीता का बचपन, स्वयंवर, सुख-दुःख विस्तार
में लिखा गया है.’ बाक़ियों को भी मैंने यह बात बताई थी.
कल
साहिर के साथ मैं ‘अक्षरों का महत्व’ पढ़ रही थी. बात-बात में हम कबीर पर पहुँच गए.
बात ऐसे निकली कि लिखे हुए अक्षरों का महत्व तो है लेकिन बात में अगर दम है तो
आपकी बात लोगों तक पहुँच ही जाती है – जैसे कबीर. इस पर साहिर की आँखें चमकीं और
वह बोला, ‘कबीर के ही गीत तो बाबा गाता
है.’ मैंने हामी भरी.
साहिर
मुझसे कबीर के दोहे सुनाने को कहने लगा. मैंने एक दोहा सुनाया. फिर हमने मिलकर
कबीर के कुछ गीत भी गाए. कबीर से हम रहीम के दोहे पर पहुँच गए. उसने मुझे उनका एक
दोहा सुनाया, ‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय, टूटे पै फिर न जुड़े जुड़े गाँठ
परि जाए.’
मैंने
कहा – ‘रहीम अपने इस दोहे का काट ख़ुद ही देते हैं और कहते हैं -
‘टूटे
सुजन मनाईये जो टूटे सौ बार,
रहिमन
फिरी फिरी पोहिए टूटे मुक्ताहार’
उसने
पूछा, ‘मतलब?’
‘मतलब
अगर कोई अच्छा आदमी, अच्छा दोस्त रूठ जाए तो उसे बार-बार मनाना चाहिए, जैसे मोती
की माला कितनी ही बार टूट जाए हम उसे बार-बार उठाते हैं और फिर से पिरोते हैं.’
मैंने कहा.
थोड़ा
गंभीर होकर वह बोला, ‘नभु तो मुझे नहीं मना रहा. दरअसल उसे पता ही नहीं चल रहा है
कि उसका एक अच्छा दोस्त रूठा हुआ है.’
दो
दिन पहले बच्चों के बीच हुए झगड़े में हाथ-पैर सब चले थे. दोनों ही तरफ़ से.
मैंने
बात घुमाई. कहा, ‘तुम्हें पता है सारे मज़हबों में जो कुछ कॉमन बात है उनमें एक है
‘माफ़ करना’. Christ सूली पर चढ़े हुए थे उस वक़्त भी उन्होंने उनको माफ़ किया जिन्होंने
उनके साथ बुरा किया...’
मैं
कुछ आगे कहती कि वह बोला, ‘बुद्ध भी तो ऐसा करते थे. एक आदमी उनको गाली देकर चला
गया और वो ग़ुस्सा नहीं हुए. बाद में उस आदमी को माफ़ भी कर दिया. और महावीर भी
उन्हीं के आस पास हुए हैं तो वो भी शायद ऐसा ही करते हों.’
मैंने
कहा, ‘मैंने महावीर के बारे में ज़्यादा नहीं पढ़ा है पर मुझे लगता है कि वो भी ऐसा
ही करते होंगे. क़ुरान शरीफ़ में अल्लाह के बारे में कहते हैं कि वो रहीम और रहमान है
यानी उसका दिल बहुत बड़ा है और वो माफ़ करने वाला है..’
‘मम्मा
प्रोफ़ेट की एक कहानी बहुत मज़ेदार है... औरत और कचरा फेंकने वाली... एक गली से
प्रोफ़ेट रोज़ गुज़रते थे और एक औरत रोज़ उनके ऊपर कचरा फेंक देती थी. प्रोफ़ेट कचरा
साफ़ करके आगे निकल जाते थे. उसको कुछ बोलते भी नहीं थे. एक रोज़ जब प्रोफ़ेट वहाँ से
गुज़रे और उस औरत ने कचरा नहीं फेंका, तो प्रोफ़ेट सीधा उसके घर पहुँच गए. देखते
क्या हैं कि वो बीमार पड़ी है... उस औरत की देखभाल की...’
‘सावित्री
बाई फुले जिन्होंने हिंदुस्तान में लड़कियों का पहला स्कूल खोला...’ मैंने बताना
शुरू किया.
‘जिनका
पोस्टर मेरे स्कूल में पाँच सितम्बर को लगा था...’
‘हाँ...
उनको और उनके पति ज्योतिबा फुले को तो लोगों ने इतना सताया कि मत पूछो...’
‘क्यों?’
‘तब
लड़कियों को पढ़ाना बुरा मानते थे.’
‘आज
भी बहुत सारे बुद्धू लोग ऐसे हैं... तो उन्होंने भी सबको माफ़ कर दिया?’ साहिर ने
पूछा
‘उन
लोगों ने ठान लिया था कि उन्हें हर हाल में ये काम करना है...’
‘लड़कियों
को पढ़ाने वाला?’ साहिर ने पूछा.
‘हाँ.
लोगों की नाराज़गी और ग़ुस्से से अगर वे घबरा जाते तो ये काम कैसे हो पाता?’ मैंने
कहा.
’‘मम्मा
ये सब लोग सच में हुए थे. एकदम सच में?’ साहिर ने बहुत हैरान होकर पूछा.
‘एकदम
सच में.’ मैंने कहा.
‘तुमने
जो मौल्ला की कहानी बताई थी वो भी सच में हुई थी? कोई कहानी या कहानी वाले लोग
नहीं हैं ये?
‘हाँ
जी, ये सब सच में हुए थे. मौल्ला भी सच में हुई थी... ये सब सच्ची कहानी के लोग
हैं.’ मैंने हँसते हुए बताया.
‘तो मम्मा,
मेरा एक क्वेश्चन है. अगर मौल्ला ने सीता के बारे में ज़्यादा लिखा तब उसकी किताब का नाम ‘मौल्ला सीतायनम’ होना चाहिए था न. वो ‘मौल्ला रामायणम’ क्यों
है?’
सवाल
वाजिब था पर मेरे पास कोई जवाब नहीं था. मैंने इसपर सोचा ही नहीं था. किसी तरह
जोड़-तोड़कर इतना ही कह पाई - ‘शायद मौल्ला ने इसके बारे में सोचा नहीं होगा. अगर
सोचतीं तो ज़रूर अपनी किताब का नाम ‘मौल्ला सीतायनम’ रखतीं.’
‘अक्षरों
का महत्व’ पाठ का अभ्यास कहीं पीछे रह गया था. साहिर ने मुझे मेरी ही बात समझा दी
थी कि लिखे हुए को शब्दशः मान लेने से अच्छा है खोजी बनना!
इतने
में साहिर को बुलाने उसके दोस्त आ गए और वो ‘ज़ुईईई’ की आवाज़ निकालता हुआ खेलने भाग
गया.
p.s. साहिर को बताते समय मैं बहुत देर तक
सोचती रही कि जिस धर्म में मैं पली-बढ़ी, उसमें ऐसे कोई देवी-देवता हैं जो माफ़ करने का सन्देश देते हैं? मेरा ज्ञान
बहुत सीमित है या सच में कोई भगवान् ऐसा नहीं जिसने अपनी शक्ति का प्रदर्शन शत्रु
को माफ़ कर के किया हो!
(23.08.16.)
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