कल मैंने साहिर को पढाई न करने के लिए डांटा. पलट कर उसने
भी मुझे डांटा. उसके ऊपर अपना रौब गाँठने की मंशा से मैंने और ज़ोर से डांटा. कहा, ’ख़बरदार जो धमकी भरे स्वर में तुमने बात
की.’
साहिर ने हँसकर पूछा,’ व्यंजन में बात हो सकती है?’
उसका जवाब सुन मुझे बहुत ज़ोर की हँसी आई पर माहौल की
गंभीरता बनाये रखने के लिए मैंने गंभीर चेहरा बनाए रखना मुनासिब समझा.
रात में सोते समय साहिर कहानी सुनाने की ज़िद करने लगा. मुझे
कोई कहानी याद नहीं आ रही थी. उसने कहा कोई छोटी-मोटी ही सुना दो. मैंने
स्वर-व्यंजन वाली घटना को किस्से के रूप में सुनाना शुरू कर दिया. साहिर ने चीख़ कर
कहा, ‘ऊऊऊऊऊऊ ये नहीं, ये तो पता है.’ मैंने कहा, ‘इस
कहानी का अंत दूसरा है. इसमें जब बच्चा पूछता है कि क्या व्यंजन में सुनाऊँ तब
उसकी मम्मा कहती है... ठहरो अभी पूरा व्याकरण बताती हूँ.’
हम तीनों हँसे और नींद की गोद में खो गए... जहाँ न स्वर था
न व्यंजन और न ही कोई व्याकरण! (05.07.15)
ऊपर का क़िस्सा लगभग साल भर पुराना है. इतने दिनों में क्या कुछ बदला है इसका
अंदाज़ा हमें इस शनिवार को हुआ जब हम साहिर के स्कूल गए. उस दिन स्कूल में PTM था. पिछले दिनों परीक्षा हुई थी और अब हमारे
सामने साहिर की कॉपियां थीं. उसने पहले ही बता दिया था कि साइंस में वह अपनी क्लास
में अव्वल आया है, बाकी विषयों में ठीक-ठाक नंबर मिले हैं. बस हिन्दी में ही उसे
बहुत कम नंबर मिले हैं. बहुत कम यानी 90 में 59. मैं घर से ही सोच कर निकली थी कि
जाते ही सबसे पहले हिन्दी की कॉपी देखूँगी.
पहले सवाल के कई भाग थे. ये सभी एक अपठित गद्यांश से थे जिसमें तीन तरह की भाषा
का ज़िक्र था—मातृ भाषा, राष्ट्र भाषा और अंतर्राष्ट्रीय भाषा.
पहला सवाल - भाषा के कितने रूप हैं? आपके अनुसार उत्तम कौन सी है?
साहिर - भाषा के तीन रूप हैं. मेरे हिसाब से मौखिक भाषा सर्वश्रेष्ठ
है.
दूसरा सवाल- राष्ट्र भाषा में आप क्या बदलाव लाना चाहेंगे?
जवाब- मैं चाहूँगा कि व्याकरण ना पढ़ाया जाए.
साहिर ने दिल की आवाज़ पहले पन्ने पर ही उतार दी थी. कहने की ज़रुरत नहीं ‘भाषा
के तीन रूप हैं’ जवाब को छोड़कर बाक़ी के लिए उसे शून्य मिला. वैसे शून्य से उसे कोई
परहेज़ नहीं है. थोड़े दिनों पहले ‘बिग बैंग’ थ्योरी पढ़कर कह रहा था, ‘सब कुछ शून्य
से ही निकला है. फिर शून्य से डरना कैसा!’
मगर उसे शून्य से निकले व्याकरण से ज़रूर डर लगता है. इतना कि थोड़े- थोड़े दिनों
में याद दिला देता है कि आठवीं के बाद उसे हिन्दी नहीं पढ़ना!
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