ददिहाल-ननिहाल,
अड़ोसी-पड़ोसी, यहाँ तक कि लगभग पूरा मोहल्ला ही ‘मूर्तिवाले’ भगवान् की भक्ति में
लीन हो और और जब अपने ही घर में ऐसा न दिखे तब? तब विहान के मन में कैसे-कैसे सवाल
आते हैं! आइए जानते हैं सास्वती की ज़ुबानी विहान की कहानी.
नास्तिकता
का तो पता नहीं पर घर में पूजा पाठ का रिवाज न के बराबर है. घर के एक हिस्से में एक अलमारी में मूर्तियाँ रखी हैं. माँ यानी विहान की नानी जब घर
आतीं हैं तब उस अलमारी के ऊपर का हिस्सा खुलता है. यूँ कहिए मंदिर का कपाट खुलता
है. उसकी साफ़-सफ़ाई होती है. और फिर नियम से उतने दिनों तक दिया-बाती होती है. पूरी
श्रद्धा के साथ माँ पूजा करती हैं. घंटी की आवाज़ और गीत पहले भी मुझे भाते थे और आज
भी अच्छे लगते हैं. कभी-कभी मुस्कुरा उठती हूँ ये सोचकर कि माँ की दुनिया का
रचयिता मेरे घर के एक कमरे की एक अलमारी के एक हिस्से में कैसे सिमट जाता है! अपनी
कह नहीं पाता बस हमसे सुनता रहता है! विहान
के लिए यह सब कुछ अलग सा होता है.
पिछली
दीवाली की बात है. हम जयपुर गए थे, विहान के दादा दादी के पास. हमने मिलकर दीवाली मनाई. पूजा भी हमने मिलकर
की. किसी ने पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ की और किसी ने ‘तटस्थ’ भाव से.
होठों
पे मुस्कुराहट और आँखों में चमक लिए विहान पूरे हर घर में चक्कर लगा रहा था. आज ‘भगवान्
जी’ की धूम मची थी. नए कपड़े, नए गहने यहाँ तक कि उन्हें रहने को ‘नया घर’ भी मिला
था. ऊपर से मिठाई- बताशे अलग!
शाम
में हम छत पर गए. हर छत पर फुलझड़ी और अनार की जगमगाहट और पटाखों की गूँज छाई थी. रंगीन
झालर की रौशनी में झिलमिलाता शहर जादुई लग रहा था. इस रौनक के बीच विहान के चेहरे
पर ‘सवाली’ भाव छा चुके थे.
अगले
दिन उसने सीधा सवाल किया- ‘मम्मा भगवान् कौन है? ये इसके (मूर्ति को दिखाते हुए)
अन्दर रहता है?’
मेरे
लिए इस सवाल का जवाब देना बड़ा आसान था. बरसों के मंथन के बाद मैं एक निष्कर्ष पर
पहुंची थी. मैंने कहा ‘कुछ लोग कहते हैं ये उसके अन्दर होता है. कुछ कहते हैं ये
उसके अन्दर नहीं होता. मैं भी यही कहती हूँ. ये तो हर जगह है. मेरे अंदर. तुम्हारे
अंदर. पेड़ में. पानी में. मिट्टी में. मेरे लिए nature ही भगवान् है...
अपनी
बड़ी–बड़ी आँखों से विहान मुझसे भगवान् का ‘विस्तार’ सुन रहा था. हक्का-बक्का
भौंचक्का सा. मैं महसूस कर सकती थी कि उसके मन में कुछ और सवाल पैदा हो रहे थे.
अगले
दिन विहान की दादी पूजा कर रही थीं. विहान भी वहीं पर था. माँ ने कहा, ‘आओ तुम भी भगवान् जी
की ‘जय-जय’ करो.’
विहान
ने मुस्कुराते हुए पूछा, ‘ भगवान् जी हर जगह है?’
‘हर
जगह है.’ माँ ने बताया.
‘मेरे
अन्दर भी है?’
‘हाँ.
तुम्हारे अन्दर भी है.’
‘मतलब
वो भी भगवान् है, मैं भी भगवान् हूँ?’ विहान ने अगला सवाल किया.
‘हाँ
बेटा! तुम भी भगवान् हो.’ माँ ने कुछ ख़ुश होकर ही कहा.
‘फिर
मेरी भी ‘जय-जय’ करो.’ होठों में हँसी रोककर विहान बोला.
विहान की दादी और मैंने झटपट एक भक्ति गीत के स्वर में झूमते हुए गाया, ‘विहान की जय जय, विहान
की जय जय...’ दादी ने तो उसके चरण स्पर्श के लिए अपने हाथ भी आगे बढ़ा दिए थे.
हँसते-गाते
सुबह की शुरुआत हुई. मगर शाम तक मौसम बदल गया.
विहान
‘कूदा-कूदी’ का खेल बहुत दिल लगा कर खेलता है. उसके पसंदीदा खेलों में से एक है
पलंग से ज़मीन पर कूदना. उसने ‘येsss’, ‘येsss’ की आवाज़ निकाल कर कूदना शुरू किया.
मैं उस वक़्त किचन में थी. थोड़ी देर में ‘येsss’, ‘येsss’ की आवाज़ ‘आsss’ में बदल
गई. मैं भागती हुई कमरे में पहुँची.
‘इस
bed में भी भगवान् है?’ विहान नें कराहते हुए पूछा.
‘हाँ...’
मैंने कुछ धीमी आवाज़ में ही कहा.
‘ये
गंदे वाले भगवान् हैं.’ अपने आँसू पोंछते हुए वह बोला.
इत्ते
गूढ़ भगवान् का जो हर जगह होकर भी नहीं है, मसला इतनी जल्दी तो हल होने वाला था
नहीं. लगभग दो महीने बाद यह सवाल फिर से सामने आया. उस दिन मैं विहान को खाना खिला
रही थी.
विहान
ने वही सवाल किया, ‘भगवान् हर जगह है?’
‘हाँ,
बिलकुल है.’ मैंने निवाला उसके मुँह में डालते हुए कहा.
‘प्लेट
में भी है?’
‘है.’
‘कटोरी
में भी है?’
‘है.’
‘चम्मच
में भी है?’
‘है.’
‘दाल
चावल में भी है?’
‘हाँ,
बिलकुल है.’
‘हम
भगवान् को खा भी जाते हैं?’ आँखें फाड़े उसने एक गंभीर सवाल किया.
मेरी
हँसी फूट पड़ी. ‘अरे नईंsss’ मैंने बोलना शुरू किया. लेकिन मैं बोलती क्या! मेरी तो बोलती बंद हो गई थी.
विहान
की भगवान् पर और भगवान् की ‘खोज’ जारी है...
बहुत जबरदस्त. सच में मन बताशा बताशा हो गया.
ReplyDeleteBeautiful. Still to search ...
ReplyDeleteAaati uttam lekhh keep it up ma'am
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