(इस
बार की कहानी कुछ लम्बी है सो दम साध कर तैयार रहिए. इसलिए भी दम साध लीजिए
क्योंकि इस बार कहानी साहिर के उदय चाचू की है. व्यवहार कुशल और निर्भय-निडर उदय
जी के बचपन की एक झलक है यह कहानी.)
तब
मैं सात साल का था. हम सब पटना में रहते थे.
मेरी
पीठ पर एक बड़ा घाव हो गया था. एक दिन मास्टर जी मेरी किसी कारस्तानी पर इस हद तक गुस्साए
कि उन्होंने मेरी पीठ पर दनादन छड़ी बरसा दी. होना क्या था, घाव फट गया. खून की धार
बहने लगी. इस घटना के बाद मेरी दादी ने
मेरा स्कूल जाना बंद करा दिया. उन्होंने कहा कि ऐसी पढ़ाई से न पढ़ना बेहतर है. बाद
में दादी को समझा बुझा कर मेरे नाना मुझे अपने साथ बिहटा ले आए थे. अगले तीन साल मैं
उनकी छत्रछाया में रहा.
बिहटा
चीनी मिल कैंपस में तब नाना का पूरा परिवार रहता था. नाना- नानी, मामू-मामी, मौसी,
मौसेरी बहन-भाइयों से भरपूर परिवार! चीनी
मिल के स्कूल में ही मेरी आगे की पढ़ाई हुई.
नाना
के तीन कमरों के घर की छत करकट की थी. घर के पीछे एक विशालकाय जामुन का पेड़ छत पर
छतरी की तरह तना हुआ था जो हमारे घर को कभी गरम नहीं होने देता था. मौसम में जामुन
तो इससे ऐसे टपाटप टपकते थे मानो जामुन-नुमा ओले गिरते हों. उन दिनों हम आँगन में
कपड़े सुखाने की ग़लती नहीं करते थे. और अगर ग़लती से किसी ने आँगन में कपड़े सूखने को
डाल दिए तो परमानेंट ‘जामुनी’ छींट वाला
कपड़ा हमारे लिए तैयार रहता.
हमारी
भैंसें हमारे परिवार का अभिन्न अंग थीं. हमारा उठाना-बैठना, सोना सब साथ होता था. घर
में घुसते ही ओसारे (बरामदे) की बाईं तरफ़ भैंसों के रहने की जगह थी और दूसरी तरफ़ मेरी
और नाना की. टिन के शेड में वे भी रहतीं
और हम भी. इन दो टिन के शेड के बीच से होकर घर के अन्दर जाने का रास्ता था.
हमसे
मिले बिना कोई भी अन्दर नहीं जा सकता था. जाड़े में ठंडी हवा से बचने के लिए घरवाले
पुआल की चटाई बनाते थे. वो भैंसों के हिस्से में टांगी जाती थी और हमारे भी. पुआल
का गद्दा उन्हें भी मिलता था और हमें भी. वे खल्ली- भूसा खाती थीं. यहीं पर हम
उनसे अलग थे.
हम
नहाते भी एक साथ थे. जिधर नाना और मैं सोते थे उसकी एक दीवार से लगा हुआ बाड़ा था. नुकीले
तार से घिरे इस बाड़े में छोटे-बड़े कई पेड़ थे- आम, अमरूद, केला, पपीता, तुलसी सभी
से सुशोभित और सुगंधित. इस बाड़े को पार करके थोड़ी दूरी पर एक तालाब था. इसी में
हम, भैंसें और मैं, नहाते थे.
शुरू
में मैं उन्हें नहलाने भर ले जाता था. मगर साल गुज़रते-गुज़रते जब भैंसों से मेरी
थोड़ी दोस्ती हो गई, मैं उनके साथ नहाने भी लगा. उनकी पीठ पर सवार हो मैं भी उनके
साथ तालाब में उतर जाता. नाना ने मुझे पहले ही चेताया था कि उनकी सींग मैं किसी भी
हाल में न छोडूं . पानी में जब वे घुड़की मारतीं तब मैं उन्हें और कसकर पकड़ लेता और
उनके साथ- साथ पानी की डुबकी का आनंद लेता. सावधानी बरतते हुए मैं भैंस के बच्चे की
पीठ पर कभी सवार नहीं हुआ. छोटी सींगों के हाथ से फिसलने का ख़तरा रहता है और शुरू
में मैं कहाँ तैरना जानता था. तैराक तो भैंसें थीं. लेकिन बहुत जल्द उन्होंने मुझे
अपने जैसा तैराक बना लिया था.
सुबह
लगभग चार-साढ़े चार बजे जब ठाकुरबाड़ी में हरीओम शरण के गीत बज रहे होते तब नाना
मुझे उठा दिया करते. फिर नाना और मैं
मिलकर भैसों के लिए सानी तैयार करते. दालान में बिखरे पड़े गोबर को एक जगह बुहारकर
इकठ्ठा करने का काम मेरा था.
चार-पाँच
दिनों में गोबर का अच्छा ख़ासा ढेर लग जाता. गोइठे या उपले बनाने के लिए मैं और
छोटी, मेरी मौसेरी बहन, मिलकर उसे कचरते. मैं हाफ़ पैंट पहने और छोटी अपनी फ्रॉक
घुटनों के ऊपर समेटे हुए गोबर के पहाड़ में कूद पड़ते. हमारे पैर का तीन चौथाई
हिस्सा गोबर में धँस जाता. फिर नानी या मामी उसमें पानी मिलातीं. पानी डालते ही गोबर
में पलने वाले गुबरैले और दूसरे जीव भागकर ऊपर आ जाते. फिर जिस गुबरैले की पकड़ में
गोबर का जितना हिस्सा आता उतने की गेंद बनाकर फुटबाल खेलता हुआ वह भाग लेता.
गुबरैलों
के भागने के बाद हम दोनों बच्चे निश्चिंत होकर उसमें क़दमताल
करते... एक–दो–एक... समझिए पैरों से आटा गूँधते. जब बदबू नाक में घुसती तब मैं
‘ख़ुशबूदार एंटी सेप्टिक क्रीम बोरोलीन’, (एक प्रचार गीत जो उन दिनों रेडियो पर ख़ूब
बजता था) गुनगुनाने लगता.
गोबर
बस कहने को काला था, मगर उसने हमारा जीवन रौशन किया हुआ था. जानवर और इंसानों के
पाखाने में एक बड़ा फ़र्क़ होता है. कुछ जानवरों के मल को कई इंसान के भोजन से भी
पवित्र समझा जाता है.
इस
काम में हमारी कसरत की कसरत और काम का काम दोनों हो जाते. तीसरा फ़ायदा यह था कि
हमारे पैर चेहरे से भी ज़्यादा साफ़ हो जाते. शरीर की सफ़ाई करने के लिए हमें एक ख़ास
चीज़ मिलती थी—नेनुआ का ‘सन’. सबसे बड़ा वाला नेनुआ जिससे अच्छे बीज मिलने की
संभवाना होती, सुखा लिया जाता. सूखने पर बीज निकाल लिए जाते और नेनुआ की खोली
बनती हमारा ‘सन’. रसायन-रहित नहाने का उत्तम उपाय!
गोइठे
बनके जब तैयार होते तब उन्हें मचान पर पहुँचा दिया जाता. मचान घर के अंदर था. आँगन
के एक हिस्से में एक तरफ़ कुआँ था और दूसरी तरफ़ मचान. उपले का स्टॉक जमा करने का
काम बरसात शुरू होने के पहले ही हम पूरा कर लेते. जाड़े में जानवरों और ख़ुद को
मच्छरों से बचाने के लिए गोइठे से हम धुआँ करते. हमारा खाना भी उसी से पकता. ठण्ड
बढ़ती तो बोरसी में भी यही इस्तेमाल होता. जाड़े में गोइठे पर लिट्टी सेकते. बीच में
गोइठे पर लिट्टी सिकती और उसे घेरकर पूरा परिवार बैठा होता. साथ में चल रहा होता
गप सड़क्का, हँसी-मज़ाक, प्यार दुलार... वो लिट्टी
सच में ‘स्पेशल’ थी!
जाड़े
में ही गोइठे निकालते हुए कभी-कभी साँप के भी दर्शन हो जाते. साँप का डर सिर्फ़
वहीं नहीं था. आँगन के पीछे भी था. जहाँ था खुला जंगल, दिन का मेरा बसेरा. जंगल
कभी मुझे कुछ खिला देता, कभी अपनी छाँव में सुला लेता तो कभी अपने आँगन में
यूँ हीं ‘फकैती’ मारने देता. यह सब सुविधा
जंगल सिर्फ़ मुझे नहीं बाक़ी जानवरों, पंछियों और साँपों को भी देता था.
नानी
एक बात से बहुत डरती थीं. दूसरे का बच्चा यानी मैं उनके घर में था. कहीं साँप ने
मुझे डस लिया तो? मेरे मौसेरे भाई मुन्ना ने
नानी के इस डर का एक अजीब समाधान सुझाया. मेरी तो हालत पतली थी पर बाक़ी लोगों ने
सहर्ष हामी भर दी. इस योजना को अंजाम देने के लिए अगली ही सुबह मुन्ना भइया एक
चूहेदानी के साथ हाज़िर थे. बोले, ‘एकरा में एगो छुछुंदर पकड़े के हई. छुछुंदर
पकड़ा जतई त ओकरा से तोरा हथवा पर कटवबई...’
इधर ऐसी
मान्यता प्रचलित है कि अगर किसी को कभी छुछुंदर ने काट लिया है तो फिर उसे जीवन भर
साँप नहीं काटता है. यानी मुझे छुछुंदर से कटवाने की तैयारी शुरू हो गई थी.
पहले
चूहेदानी में चूहे ही फँसते रहे. आख़िरकार
एक हट्टा- कट्टा छुछुंदर फँसा. उसे देख मुन्ना भइया ख़ुशी से नाचते हुए बोले, ‘अन्टुआ
रे! तोहर काम हो गेलऊ.’ उन्होंने
मेरे एक हाथ में एक गमछा लपेटा. दूसरे गमछे से उन्होंने अपना एक हाथ अच्छे से
लपेटा. मुझे गमछे वाला हाथ छुछुंदर की ओर बढ़ाना था.
मैंने
दांत पर दांत बिठाए और बड़ी हिम्मत से दायां हाथ आगे बढ़ा दिया. दूसरे हाथ से
दाएं हाथ की कुहनी को भी ज़ोर से पकड़े रहा. छुछुंदर के दांत जितने डरावने थे उतने
ही पैने भी थे. मुन्ना भइया ने उसकी गर्दन कसकर पकड़ी थी. मैं उसके बारे में कुछ और
सोचता इसके पहले ही वह अपना काम कर चुका था. अपने पैने-नुकीले दांत वह मेरे अंगूठे
के पास गड़ा चुका था. मैं दर्द से कांप उठा पर रोया नहीं. छुछुंदर का काम पूरा होते
ही मुन्ना भइया दौड़कर उसे आँगन के पीछे वाले जंगल में छोड़ आए. लौटते में ‘केकरौन्धा’
का पत्ता भी ले आए और घाव पर अच्छे से मल दिया.
मुझे
याद है जब वे मुझे नाना के पास ले गए तो नाना ने मुझे ढ़ेरों आशीर्वाद दिए. उनका
आशीर्वाद मिलते ही मैंने मान लिया कि अब मुझे साँपों से डरने की कोई ज़रुरत नहीं.
इस
घटना के बाद की बात है. नानी ने मुझे एक थैला थमाते हुए कहा, ‘जो, पेड़ से जामुन
तोड़ के ले आओ. सिरका बनावे ला है.’ मैं
पेड़ पर चढ़ने लगा. काफ़ी ऊँचाई पर था जब कोई आठ-नौ फ़ीट की दूरी पर एक साँप पेड़ की
डाली में लिपटा हुआ दिख गया. मैं तो छुछुंदर का काटा हुआ था फिर भी उसे देखते
ही पेड़ से सरपट सरक लिया.
घर
आकर मैंने नानी को साँप वाली बात बताई. सुनते ही नानी ने मुझे डांटा. बोलीं,’ ‘रे
मोछकबरा के बेटा खेले गुने कहअ हहीं कि
पेड़ में साँप लटकल हई... भाग त हियाँ से...’
नानी समझ रही थीं कि मैं खेलने के चक्कर में बहाने बना रहा
हूँ. उन्होंने
मुझे ‘मोछकबरा का बेटा’ कहा था.
यानी मैं ऐसे बाप का बेटा हूँ जिसकी मूँछ कबड़ (उखड़) चुकी है. इस बात से मुझ
निमुंछिए में मूँछों वाला ताव चढ़ गया. पर
वह साँप के ख़याल भर से ही उतर भी गया.
इस
बार मैंने अपनी रक्षा के लिए मुन्ना भइया को अपने साथ लिया. बनी-बनाई लग्घी घर में
थी नहीं, सो वे एक डंडा लेकर आए. साथ में लकड़ी का एक छोटा टुकड़ा और रस्सी भी. पेड़
के नीचे वे लग्घी बनाते रहे. इधर
मैं साँप पर नज़रें जमाए पेड़ पर चढ़ने लगा. उससे दूरी बनाते हुए मैं भी एक डाल से
चिपक गया. कुछ पलों के लिए ही सही, अलग-अलग डालियों से लिपटे,
हम जामुन के पेड़ के सह-निवासी बने थे.
मुन्ना
भइया ने लग्घी थमाते हुए मुझे बहुत भरोसा दिया. साँप अब तक अपनी जगह से हिला भी नहीं था. मैंने बड़ी हिम्मत से लग्घी में साँप को फंसाया. सोच ही रहा
था कि कहाँ फेंकूं कि साँप समेत लग्घी हाथ से छूट गई. नीचे का नज़ारा ऐसा था कि एक
तरफ़ मुन्ना भइया भाग रहे थे दूसरी ओर साँप.
मैंने
थैला भर जामुन तोड़े. उनसे नानी ने चटखारेदार सिरका बनाया जिसे हम महीने भर चटखारे
ले-लेकर चाटते रहे.
धीरे-
धीरे साँप का ही नहीं मेरा हर तरह का डर भाग चुका था. मैं ननिहाल से निर्भय-निडर
होकर वापस आया था. आज सोचता हूँ तो लगता है छुछुंदर के कटवाने भर से मेरा डर नहीं
भागा था. दरअसल वह भागा था बार- बार चारों तरफ़ के लोगों से मिलने वाले भरोसे से... जिसने मुझे अपने ऊपर भरोसा करने का हौसला दिया था.
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