बन्दर घुलाटी मारना, चिकोटी काटना, पेड़ से आम गिरता देख सबसे पहले दौड़ लगाना, कैमरे
के लिए मचलना, वादा करके बड़ी सफ़ाई से मुकर जाना और जादूगर भईया जब बोलें ‘इधर
देखिए’ तब दौड़ कर उनके पीछे जाना और ज़ोर से कहना ‘ उनको नहीं हमको देखिए’... ये हैं हमारे लल्ला की ख़ासियत.
कमला नेहरु शिशु विहार में समर कैंप के दौरान पिछले साल उससे भेंट हुई. वह
दूसरी क्लास में पढ़ता है. वैसे तो उसका नाम कृष्णा है लेकिन उसकी बड़ी बहन प्यार से
उसे लल्ला बुलाती है. तो ये हम सब के लिए ही लल्ला और लला हो गए.
वर्कशॉप में सबसे छोटा लल्ला ही था. हम सब उस पर ख़ास ध्यान देते...यानी, कहाँ
है, कोई उसे तंग तो नहीं कर रहा, कहीं वो तंग तो नहीं हो रहा. 3-4 दिन लगे थे हमें
यह समझने में कि उसके चेहरे पर प्रताड़ित होने का भाव तो दरअसल चकमा देने के लिए
था. वह सुषमा दीदी को बड़े चुपके से चिकोटी काटता या उनकी छोटी पीछे से खींच देता. फिर
मासूम-सा चेहरा बनाकर इधर-उधर देखता. सुषमा ने एक दिन उसकी चोरी पकड़ ली और हाथ
उठाकर उसके पीछे दौड़ी. ‘ हमको मार रही हैं...हमको रोज़ मारती हैं...’ कहता हुआ
लल्ला हमारी तरफ़ दौड़ा. छोटे बच्चे के ऊपर ज़ुल्म की दौड़ सबने देखी.
एक दिन की बात है. सभी बच्चे अपने-अपने काम में मशगूल थे. कुछ कैमरा चलाना सीख
रहे थे, कुछ पत्ते चुन रहे थे, कुछ पत्तों को जमा करने की जगह बना रहे थे और कुछ स्कूल
के परमानेंट अतिथियों (कुत्तों) के साथ अपना नाश्ता बाँट रहे थे. लल्ला ने कैंपस
से एक पत्ता उठाया और सबको दिखा-दिखा कर कहने लगा, ‘देखो न! कईसा पत्ता है? देखे
हो अइसा पत्ता?’
सभी अपने काम में लगे थे, किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया. लल्ला का
चेहरा उतर गया मगर वह हार मानने वाला कहाँ था! थोड़ी दूरी पर लड़कियों की एक टोली
हँसने- खिलखिलाने में व्यस्त थी. आँखों में चमक और होठों पर हल्की मुस्कुराहट लिए
लल्ला उधर दौड़ा.
उन्हें पत्ता दिखाकर बहुत वज़नदार आवाज़ में बोला, ‘देखी हो जी अइसा पत्ता ! आएं?
अइसा पिम्पलवाला पत्ता देखी हो? इतना
पिम्पल है तुमलोग को?’
पिम्पल वाली बात पर लड़कियाँ हँसने लगीं और पहले अपना गाल और फिर पत्ता छूने
लगीं. सुषमा दीदी भी हँसने लगीं. लल्ला का मिशन पूरा हो गया और वो मुस्कुराता हुआ अपनी जगह पर आकर बैठ गया.
कोई देखा है जी ऐसा पिम्पल वाला पत्ता...आएं?
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