Tuesday, April 19, 2016

तबस्सुम


सुबह वेटनरी कॉलेज की तरफ़ टहलने निकली थी. सूरज अभी सोकर उठ रहा था. उसकी अलसाई रौशनी में हम सभी नहा रहे थे—बच्चियाँ, बच्चे, बूढ़ियाँ, बूढ़े, जवान, पहलवान, पेड़, लत्तर, वेटनरी कॉलेज, ईदगाह, दुकानें, कूड़ेदान, मुर्गे, कुत्ते, सूअर, इमू...सभी.

कैंपस में एक बरगद का पेड़ है जिसकी जड़ों को पकड़ सुबह-सुबह लड़के लम्बे और मज़बूत होने की तमन्ना में लटकते दिखाई देते हैं. कभी किसी के हाथ से बेल छूट जाए तो ठहाके गूँज उठते हैं. कभी-कभी चिड़ियाँ की बोली और उनका स्वर घुल मिल जाता है. लड़कियों की मुस्कराहट दिखाई देती है पर सड़कों पर उनका ठहाका सुनायी नहीं देता. मन में बात आई कि ठहाकों की सत्ता अभी लड़कों के ही पास है.

दो जगहों पर गार्ड अपनी यूनिफार्म में बैठे दिखाई देते हैं. लोगों को देखते परखते, नज़रों से नज़रें मिलाते लेकिन एक जगह पर चुपचाप. कभी सर नीचे करते और दिल लगाने के लिए अपनी लाठी एक दो बार बजा भी लेते.

रौशनी में नहाए चटख हरे पत्तों, सेमल की उड़ती रूई, सुबह की हल्की ठंडी हवा की ख़ुशबू में मन आध्यात्मिक सा हो जाता है. पेड़ों से गिरे सूखे पत्तों के ढेरों से उठता धुआं माहौल को और रहस्यमय बना देता है. गुलमोहर के पेड़ों से लटकते लाल झूमर साक्षात ज्ञान के फ़ानूस नज़र आते हैं.

आज मेरे आगे दो छोटी बच्चियां चल रही थीं. सलवार-कुर्ता पहने और सर पर स्कार्फ़ बांधे. दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ था. एक तीन-चार बरस और दूसरी सात- आठ बरस की रही होगी. छोटी वाली को लगता है जैसे सोते से उठा दिया गया था. उसका चेहरा और चलने का अंदाज़ यही बता रहा था.

मैंने बड़ी से पूछा, ‘कहाँ जा रही हो?’ सुनते ही उसने छोटी का हाथ और कस कर पकड़ लिया.

मैंने सवाल बदला. ‘घर जा रही हो?’ इस बार उसने हाँ में गर्दन हिलाई. छोटी के चेहरे का भाव कह रहा था, ’क्यों तंग कर रही हैं?’ उसकी भवें आपस में मिलने लगीं और आँखें सिकुड़ कर छोटी हो गई थीं.

अब दोनों पहले से तेज़ चल रही थीं. मेरी तरफ़ देखने से भी बच रही थीं. फिर वे एक चाय की दुकान में घुस गईं. मेरा टहलने का समय पूरा हो गया था. मैं लौट आई.

शाम में कुछ काम से बाहर निकली थी. इस वक़्त सूरज सोने की तैयारी में था. देखा, एक बच्ची अपने दोनों हाथ बांधे मेरी ओर देखती हुई मुस्कुरा रही थी. मैं भी मुस्कुराई और पहचानने की कोशिश करने लगी. पास पहुँचते ही उसने कहा, ‘आज आप हमको मिली थीं न?’

मैंने कहा, ‘अच्छा! तुम हो! हाँ, हमलोग सुबह में मिले थे. यहाँ क्या कर रही हो?’

‘हियां टूसन पढ़े आते हैं.’ एक घर की ओर आँखों से इशारा करते हुए उसने बताया.

‘अच्छा! नाम क्या है तुम्हारा?’ मैंने पूछा.

‘तबस्सुम.’ मुस्कुराती, इतराती हुई वह बोली.

‘बहुत सुन्दर नाम है.’ मैंने कहा.

‘आपका का नाम है?’ उसने पूछा.

‘स्वाती.’

‘का?’

‘स्वाsssती.’

इतनी देर तक वह अपने  दोनों हाथ बाँधे हुई खड़ी थी. मेरा नाम सुनते ही एक हाथ से अपने मुँह को दबाया और हँसने लगी. दूसरा हाथ वैसे ही उसके पेट पर था.

‘मुँहे में नहीं चढ़ रहा है आपका नाम.’ मुँह पर से हाथ हटाते हुए उसने हँसते-झूमते कहा.  मुझे भी हँसी आ गई. ‘फिर भी अच्छा नाम है.’ उसने अगली बात कही.

इतने में गली के मोड़ से किसी ने उसे पुकारा. ‘अइते ही..’ कहती हुई तबस्सुम उधर दौड़ पड़ी.

मैं उधर देखती रही. सोता-जागता सूरज आज दोनों ही वक़्त हमारे साथ था.


4 comments:

  1. मासूमियत... मुंहे में नहीं चढ रहा है आपका नाम... :-) एक और बताशा घुलकर मिठास छोड़ गया. बेहतरीन कहानी!

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  2. मासूमियत... मुंहे में नहीं चढ रहा है आपका नाम... :-) एक और बताशा घुलकर मिठास छोड़ गया. बेहतरीन कहानी!

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  3. As always, brilliantly written!

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