साहिर छठी क्लास में चला गया. जिस
विषय में उसे सबसे कम नंबर मिले हैं वह है हिन्दी. वह पहले ही घोषणा कर चुका है कि
हिन्दी में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है. कई बार हमसे पूछ चुका है कि आख़िर और कितने
दिनों तक उसे 'शुद्ध ' हिन्दी पढ़ना और लिखना है!
शुरुआत ऐसी न थी. उसने मात्र दो महीने में हिन्दी पढ़ना और लिखना सीखा था.
कहानियों की किताबें लेकर खेलता और फिर पढ़ने की कोशिश करता. हमारे पास भी किताब
लेकर आता और कहता ‘सुनाओ.’
जब वह लगभग तीन साढ़े तीन साल का था तब उसने एक तुकबंदी बनाई थी
‘माचिस
जली ठक
चूल्हा जला भक’
पांच साल की उमर में उसने एक कविता बनाई थी. (देखें पहला पोस्ट ‘हवा’.)
‘पेड़ अच्छे होते हैं
सबको कुछ -कुछ देते हैं
अच्छे पेड़ प्यारे पेड़
लोगों से प्यार करते हैं
प्यार लेकर लोगों से पेड़ प्यार करते हैं’
जैसे-जैसे उसका स्कूल से वास्ता बढ़ा उसका ‘हिन्दी’ भाषा से प्रेम कम होने लगा.
तत्सम-तद्भव, देशज-विदेशज, शुद्धता-अशुद्धता के बोझ तले उसकी अपनी भाषा दबने लगी.
कई कारणों से हमने उसका स्कूल कई बार बदला. ज़्यादातर स्कूलों में ‘हिन्दी’ और
‘हिन्दी’ मैम के साथ साहिर की संघर्ष की
स्थिति बनी रही. तीन साल पहले जिस स्कूल में था वहाँ की हिन्दी मैडम ने ‘वृक्ष’ पर
एक लेख लिखने को दिया था. साहिर ने दिल लगा कर लिखा. उसमें उसने कई तरह की बातें
लिखीं. जैसे, पेड़ पर चिड़िया का घर होता है. पेड़ सबको ठंडी हवा देते हैं. पेड़ में
हरे-हरे पत्ते होते हैं.. जैसे कुछ वाक्य थे. ऐसे ही कुछ 8-10 वाक्य रहे होंगे.
उसका हर वाक्य ‘पेड़’ से शुरू होता था. शिक्षिका महोदया ने सभी पेड़ को एक बड़े से
लाल घेरे में डाल दिया और बगल में लिख दिया ‘वृक्ष.’
उसी दौरान पुस्तकालय पर भी एक लेख लिखने को दिया गया था. साहिर ने कुछ ऐसा
लिखा था—‘ हमारे स्कूल में एक पुस्तकालय था. उसमें बहुत सी किताबें थीं. हम वहाँ
जो चाहें सो किताब पढ़ सकते थे. अब कुछ महीनों से पुस्तकालय की क्लास नहीं होती.
वहाँ कंप्यूटर रूम बन गया है. काश! वह पुस्तकालय फिर से आ जाए!’
शिक्षिका ने उसे काट कर एक शानदार लेख लिखवाया जो कुछ ऐसा था—हमारे विद्यालय
में एक शानदार पुस्तकालय है. यह शानदार पुस्तकों से भरा है. पुस्तकें ज्ञान का
रास्ता दिखाती हैं. यह हमें हार्दिक प्रसन्नता देता है... वगैरह वगैरह!
हम साहिर की कॉपी लेकर प्रिंसिपल से मिलने गए. प्रिंसिपल ने हमारी बात अच्छे
से सुनी और फिर एक ज़बरदस्त नियम बनाया--- प्रिंसिपल के कमरे तक पहुँचने के लिए कोई
बड़ी वजह या जटिल मामला चाहिए अन्यथा अभिभावक स्कूल गेट के बाहर खड़े रहें.
साहिर का मन हिन्दी पढ़ने से उचटता जा रहा था. हिन्दी की कॉपी शिकायतों से भरी
रहती—‘गृह कार्य पूरा करें. कृपया अपनी लिखावट सुधारें. कार्य अधूरा है. ध्यान से
लिखें.’ बाक़ी विषयों में उतनी शिकायतें नहीं होतीं.
घर पर हमने कुछ कोशिश की कि उसका मन इस भाषा से डरे नहीं. नहीं! वह डरता कहाँ
था! जो भाषा वह किताब में पढ़ रहा था उसका उसके जीवन में कोई इस्तेमाल नहीं था. जो
वह लिखता शिक्षिका महोदया की नज़र में उसका कोई स्थान न था. किसी भी तरह से ख़ुद को
व्यक्त करने का मौका नहीं था—न बोलकर, न लिखकर. ऊपर से ‘व्याकरण’ की जटिलताएं.
घर पर वह कहानियों की किताबें पढ़ता, हिन्दी में भी और अंग्रेज़ी में भी. शब्दों
के साथ वह खेलता. कभी-कभी मैं उसे कुछ शब्द देती और वह झटपट एक छोटी-मोटी कविता
बना देता. फिर वह मुझे भी कुछ शब्द देता और मुझे भी कविता बनाने की कोशिश करनी
पड़ती हालांकि कविता बनाना मेरे किसी हाथ का खेल नहीं.
आज कुछ कविताएं साझा कर रही हूँ जो साहिर ने लगभग दो साल पहले यानी जब वो
तीसरी क्लास में था तब बनाई थीं.
चुलबुला
बच्चा था एक चुलबुला
नाम था उसका बुलबुला
थे उसके एक भइया
नाम था उनका भुरभुरा
छोटा बुलबुला गिर पड़ा
भइया भुरभुरा हँस पड़ा
पापा जी
एक हमारे दादा जी हैं
एक हमारे नानाजी
चाचा मामा बहुत बहुत हैं
लेकिन रहते दूर बहुत हैं
पापा जी हैं पास हमारे
करते नाटक वे कई सारे
होली
लेकर आई होली
कई बच्चों की टोली
एक लड़की बोली
फेंको रंगों की गोली
साथ में गुब्बारों की झोली!
हाय-हाय
जब कोई पूछे, ‘क्या हाल’
मम्मा बोले, ‘हाय मेरे बाल,
झड़ते जाते वे हर साल’
हाल पूछना बन जाता काल!
साहिर बोले, ‘बालों का जाल’ !
मात
मम्मा बाबा और साहिर रहते साथ
घूमने जाते ले हाथों में हाथ
करते रहते ख़ूब बात ही बात
अगर कोई अड़ाता उनकी बातों में लात
दे देते वे हर लात को मात !
घर पर और स्कूल में दो अलग अलग तरह की कोशिशें चल रही थीं. पांचवी क्लास में
संयोग ऐसा हुआ कि क्लास टीचर हिन्दी की टीचर थीं. उन्हें भी साहिर से बहुत
शिकायतें रहीं—‘ बहुत स्लो है. लिखता ही नहीं है. लिखावट बहुत ख़राब है. इसकी कॉपी
उठाकर देख लीजिए कुछ करता ही नहीं है—ये सभी बातें वे कई अभिभावकों के सामने तब बोल
रही थीं जब उनका और हमारा पहला आमना-सामना था. हम तो अभी कुर्सी पर आधे ही बैठे थे.
साहिर का चेहरा उतर गया था.
स्कूल के आख़िरी दिन कुछ बच्चे धड़ाधड़ ‘हिन्दी’ मैम के चरण स्पर्श कर रहे थे. मैम
भी भावुक हो रही थीं और उन बच्चों को आशीर्वाद दे रही थीं. साहिर और मैं भी वहीं
पर थे. साहिर अपना फ़ोल्डर उठा चुका था और न जाने किस उम्मीद में वहीं पर खड़ा था. हमें
एक और मैडम से मिलना था सो हम दूसरी क्लास में जाने के लिए मुड़ गए. शर्मिला मैम चौथी क्लास में साहिर और बाकी बच्चों को सोशल साइंस पढ़ाती थीं.
पांचवी में उन्होंने अंग्रेज़ी पढ़ाया.
शर्मिला मैम अपनी क्लास के बच्चों में मसरूफ़ थीं. हम दरवाज़े के बाहर से कनखियों
से उन्हें झाँक रहे थे. मैम की नज़र पड़ी और मुस्कुराकर उन्होंने पुकारा,
‘साहिsssर.’ हम भागते हुए उनके पास पहुंचे. शर्मिला मैम भी जान रही थीं कि आज हमें
उस स्कूल से विदा लेना था. वे बोलीं, सभी अभिभावकों के बीच में बोलीं, ‘हमको तुमपर
बहुत भरोसा है साहिर.You’ll do
something different.’ फिर एक बच्चे के पिता की ओर मुड़कर बोलीं, ‘His
comprehension is very different. बहुत ही अलग तरह के इसके जवाब
होते हैं. ये कुछ अलग करेगा.’ मैं मैम का चेहरा देख रही थी. कितनी ख़ुशी थी उनके
चेहरे पर!
मेरी आँखें भर आईं. मैंने साहिर को देखा. उसकी आँखें भी नम थीं. हम शर्मिला मैम
को इतना ही कह पाए, ‘आपको फ़ोन करेंगे.’ फिर सीढ़ियों से दौड़ते हुए नीचे की तरफ़ भागे.
मुझे ऐसा महसूस हो रहा था मानो हम दौड़ नहीं उड़ रहे हों. शर्मिला मैम ने हमें पंख
दे दिए थे—हमेशा के लिए!
सोच रही हूँ, एक ही स्कूल की दो टीचर के अलग तरह के कमेंट आए. उनका असर कितना
अलग है!
साहिर के लिए आख़िर हिन्दी इतनी पराई कैसी हो गई? जिसे बोलता हुआ वह बड़ा हो रहा
है, समय-समय पर जिसमें उसने शब्दों की कलाकारी दिखाई वही उसके लिए अब बोझिल कैसे हो
गई?
ज़रा सोचिए कि स्कूलों में, कॉलेजों में, सरकारी दफ़्तरों में, न्यायालयों में—जहाँ
भी ‘अतिवादी’ हिन्दी है वह बदलाव के नूर से रौशन हो गई है. उस ‘हिन्दी’ में ये
सारे काम काज हो रहे हैं जो हमारी बोल चाल की भाषा है, जो बगैर ‘कोश’ समझी जाती है
और जो लोगों के दिलों तक बड़ी आसानी से पहुँच जाती है!
मैं स्कूलों में बच्चियों और बच्चों के मुस्कुराते चेहरों को देख पा रही हूँ,
उनके खिलखिलाते शब्दों को सुन पा रही हूँ. आप भी इन ‘शब्दकारों’ के गीत सुन पा रहे
हैं न! जब यह लिख रही हूँ तब मेरे कानों में वे सारे शब्द गूँज रहे हैं जो साहिर खनकाता
रहता है.
bahut hi badhiya likkha tumne Swati! Mann bhar aaya... kyu har bachche ko Sharmila ma'am jaisi teacher nahi mil sakti!?
ReplyDeleteSachmuch bahut hi bhavuk lekh hai. padhkar lag raha tha mano mere sath hi ye ghatit ho raha hai.Kitne hi sahir aaj ki padhai ke bhanwar mein kulbulate rahte hai par unki kulbulahat ko samajhane wala shayad hi milta hai...Sahir khushkismat hai...Par sahir aage aapko koi mile ya na mile aap apne sath hamesha rahna aur yuhi imaandari aur masumiyat se aage badhte rahna...all the best sahir aur sahir ki mummy ko bhi...
ReplyDeleteयह है हिन्दी !
ReplyDeleteबहुत बडा द्वंद सुलझा दिया आपने. बिल्कुल साहिराना अंदाज़ में. एक और खूबसूरत मनोवैज्ञानिक कहानी.
ReplyDeleteशीर्षक बहुत ही ऊम्दा है! लिखती रहो, बच्चों की दुनिया की तुम्हारी समझ उनकी दुनिया जितनी ही सहज और सुन्दर है.
ReplyDeleteस्वातिजी, आपका लिखनेका अंदज बहुत पसंद आया।
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