Thursday, March 10, 2016

क़िस्सा ए ग़ुसल

आज साहिर स्कूल से आया और आते ही हल्ला करने लगा.. कंप्यूटर दो... कंप्यूटर दो... उस वक़्त मैं फ़ोन पर थी. मैंने दाहिने हाथ की एक ऊँगली उठाई और अपनी आँखों को बड़ा किया, दुर्गा माँ की तरह.  फिर उसे बाथरूम का दरवाज़ा दिखाया. हाथ की एक ऊँगली और आँखों के ‘कॉम्बो’ का मतलब था, ‘पहले नहाओ.’

साहिर ने मेरी कुर्सी का हत्था पकड़ा और मुझे नए-नए संबोधन देने लगा. संबोधन के साथ एक तुकबंदी भी बनाई.
‘शैतानी शैतानिनी शैताना
करती है बहाना
हम नहीं खाएंगे खाना’

उसकी बातों से मुझे समझ आ गया कि आज स्कूल में आख़िरी पीरियड संस्कृत रहा होगा. साहिर धातु रूप के  मज़े ले रहा था. नृत्य की मुद्रा में उसने एक और धातु रूप सुनाया... पाद: पादौ पादा:

यह सुनाते वक़्त उसे इतनी हँसी आ रही थी कि तीनों रूप बड़ी मुश्किल से सुना पाया था. घर में मौजूद तीन लोगों के ठहाके से घर गूँज उठा. हँसने का माहौल था और साहिर इसका फ़ायदा उठाकर ‘माउस’ पकड़ चुका था.

मैंने अब तक फ़ोन रख दिया था और सोच रही थी कि उसे बाथरूम में कैसे घुसाया जाए!  मैंने उसकी शर्ट की बांह पकड़ते हुए कहा, “छि: छि:! इतनी गन्दी शर्ट! पूरी बांह काली हो गई है. उतारो इसे और घुसो नहाने.”

साहिर ने उसे देखा और गंभीर होकर बोला, “ हाँ, अब यह उतारable है.”
मैंने कहा, “ No नहाना, No computer.”
निशाना सही लगा था. साहिर नहाने घुसा और लगभग 45 मिनट के बाद बाहर निकला.

एक तो बाथरूम में घुसता नहीं और अगर घुस जाए तो फिर निकलता नहीं.

अब चलिए ज़रा पीहू के घर के चलते हैं.

सुबह से पीहू की माँ उसके पीछे पड़ी है --उसे नहलाने के लिए. यूँ तो उसे नहाने में कोई मुश्किल नहीं होती पर आज न जाने क्या बात है!
माँ ने समझाने का चक्कर चलाना शुरू किया, “चलो पीहू. जल्दी से नहा लो. देखो आज तुम पीछे रह गई. पाखी भी नहा चुकी.”
माँ के बोल में सच्चाई को परखती पीहू ने पूछा, “और साहिर भइया?”

“हाँ! साहिर भइया भी नहा लिया.” माँ ने तपाक से कहा.

“और साहिर भइया के पापा?” पीहू ने दूसरा सवाल किया.

माँ ने फ़ौरन कहा, “हाँ! वो भी नहा चुके.”

सुनकर पीहू मुस्कुराई. फिर आँखें मटकाकर, थोड़ा शरमा कर बोली , “ हमको साहिर भइया के पापा बहुत अच्छे लगते हैं.”

“अच्छा!” माँ मुस्कुरा रही थी और नहलाने का काम जल्दी-जल्दी आगे बढ़ा रही थी.

“साहिर भइया के पापा हमको बहुत देखते हैं.” पीहू ने अपनी माँ को बताया.

माँ और बेटी दोनों की नज़रें मिलीं. दोनों मुस्कुराए.

“हम भी उनको बहुत देखते हैं.” पीहू ने अपनी बात पूरी की. पीहू उनकी बातों में ऐसे खोई कि उसका नहाना एकदम झट-पट हो गया. माँ का काम कितना आसान हो गया! माँ ख़ुशम ख़ुश!

पीहू को नहलाने के बाद मेरे पास तृप्ति का फ़ोन आया था और हम दोनों ने मिलकर एक शेर पढ़ा,
‘कौन कहता है मुहब्बत की ज़बां होती है... ये हक़ीक़त तो निगाहों से बयां होती है’

1 comment:

  1. शैतानी शैतानिनी शैताना
    करती है बहाना ... साहिर भैया की उस्‍तादन तो पीहू निकली। बहुत खूबसूरत कहानी बनी है स्‍वाती ये वाली. बहुत बधार्इ!

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