Thursday, February 18, 2016

आज मैं ऊपर आसमां नीचे...


मैं इतनी ख़ुश हूँ, इतनी हूँ खुश हूँ कि मैंने सोचा 'मन बताशा' में कार्तिक के साथ अपनी भी कहानी सुनाऊंगी.

आजकल अक्सर गाती रहती हूँ... ‘आज मैं ऊपर आसमां नीचे... जब ये गाती हूँ तो और भी ख़ुश हो जाती हूँ. ख़ुशी में सुख-दुःख का भेद मिट जाता है, तब  मैं ‘जब दिल ही टूट गया’ भी हँसते-हँसते गाने लगती हूँ.

आप भी मेरे साथ गाइए न! क्या कहा, पहले अपनी ख़ुशी का राज़ बताऊँ! तो बा अदब, बा मुलाहिज़ा होशियार, दिल थाम के तैयार होकर सुनिए, सुनिए, सुनिए... मैंने स्कूटी चलाना सीख लिया है... और तो और मैं डबल लोडिंग भी करने लगी हूँ, कार्तिक को पीछे बिठाती हूँ और स्कूटी चलाती... न न उड़ाती हूँ.

अं हं.. इसे आसान मत समझिए. बरसों लगे हैं इस ख़ाब को हक़ीक़त बनने में. लगभग दस-बारह साल पहले मैंने पहली कोशिश की थी. तब मेरा एक पैर घायल हुआ और मैं दो महीने के लिए घर में क़ैद हो गई. मेरे पैर की हड्डी तो जुड़ गयी पर मेरी टूटी हिम्मत न जुड़ पाई. प्लास्टर हटा, मैं अपने पैरों पर खड़ी हो गई पर मैंने फैसला कर लिया... न, अब दुबारा कभी नहीं. पतिदेव ने समझाया भी मगर मैं भी तो समझ चुकी थी! नतीजा, मेरी बरसों की तमन्ना तमन्ना ही रह गयी. मैं लड़कियों और औरतों को स्कूटी चलाते देखती, दिल हिचकोले खाता मगर मैं उसे संभाल लेती.

पिछले तीन साल से हैदराबाद में हूँ. जिस बिल्डिंग में हूँ कुछ महीने पहले उस के नीचे ड्राइविंग की क्लास शुरू हुई. पति महोदय ने फिर से उकसाया - ‘इस बार तो पक्का भगवान् ने तुम्हारे लिए ही यहाँ ड्राइविंग की क्लास शुरू करवाई है. अब तो सीख लो.’

मैंने पूछा, ‘पहले मुझे बताओ, पैर टूटने की हालत में दो महीने तक घर कैसे संभलेगा?’

‘पहले पैर तुड़वाकर दिखाओ, फिर बताऊंगा.’ उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा.

मन के एक कोने में जो इच्छा दबी हुई थी, ज़ोर से हिलोरें लेने लगीं. मैं तैयार हो गई. एक पुराना स्कूटी ख़रीदा और हो गई मेरी क्लास शुरू. एक्सपर्ट बनना कोई एक दिन का काम नहीं होता. धीरे धीरे रे मना, ए जी धीरे सब कुछ होए...

मैंने पहले अपनी सोसाइटी का एक चक्कर लगाया, फिर दो, फिर तीन, फिर चार... और फिर एक दिन मैंने हवा में अपने पैर छोड़ कर दिखाए. कैसा एहसास था! मानो इस पल का मुझे सदियों से इंतज़ार रहा हो. एक दिन स्कूटी से सब्ज़ी भी ले आई. सावधानी ये बरती कि सब्ज़ी का थैला छोटा रखा. भारी थैले के साथ कहीं उलट गई तो! 

अगले दिन नीचे उतरी तो कार्तिक नीचे ही खेल रहा था. मैंने कहा, ‘चल, आज थैला नहीं तुझे बिठाती हूँ. तू डरेगा तो नहीं.’  उसने कहा, ‘नहीं.’

मैंने उसे बिठाकर सोसाइटी का एक चक्कर लगाया. मेरे साथ कार्तिक भी बहुत ख़ुश हो रहा था. कहने लगा, ‘बस मम्मा, ऐसे ही confident रहो. तुम कर सकती हो. तुम सब कुछ कर सकती हो.’

दस साल के कार्तिक से ऐसे बोल सुनकर मेरी हिम्मत दोगुनी हो गई. मैंने कहा, ‘चल, अब तुझे तेरे दोस्त के पास ले चलती हूँ.’ मैंने स्कूटी की स्पीड थोड़ी बढ़ायी और ले चली उसे उसके दोस्त से मिलाने. मुझे कार्तिक पर बहुत प्यार आ रहा था. 

वहाँ से लौटते हुए रास्ते में हमने मलाई- कुल्फ़ी खाई. कुल्फ़ी का छोटा मटका देख कार्तिक ने कहा, 'मम्मा, देखो घड़ा...' 'घड़ा' सुनते ही मुझे जोर की हँसी आ गई. कार्तिक ने मुझे देखा, फिर वह भी हँसने लगा.

अभी कुछ ही दिनों पहले मेरी शादी की सालगिरह थी. सुबह हुई, पति जी हाथ में अपना बैग और खाने का डिब्बा लिए निकल पड़े. और मैं थी कि सुबह से ही शादी के दिन को याद कर रही थी. अकेले आप कितना कुछ सहेज लेते हैं! यादें तो वैसे भी बड़े कमाल की ताक़त रखती हैं - आप कुछ करते-करते कभी हँसने-मुस्कुराने लगते हैं तो कभी अचानक ही गले में कुछ चुभने लगता है! पर मुझपर तो उसी घटना का भूत सवार था. मैं किसी को वह सबकुछ बताना चाहती थी पर किसे बताती? दोपहर बाद कार्तिक स्कूल से आया. मैंने कार्तिक को बताया, ‘पता है तेरे पापा को शादी में छुट्टी ही नहीं मिल रही थी. उन्होंने कह दिया था, शादी करने नहीं आ सकता.’

‘फिर कैसे हो गयी शादी?’ कार्तिक ने हैरान होकर पूछा था.

‘मत पूछ क्या-क्या हुआ! तेरे दादा ने शादी की तारीख़ तय कर दी थी. वे अड़ गए थे. बोले- चाहे मेरा बेटा आए या ना आए, शादी तो होके रहेगी.’ मैंने उसे बताया.

कैसे भला? बिना दूल्हे के शादी कैसे होती?’ कार्तिक और हैरान हो रहा था.

‘दादा ने एलान कर दिया था, चाहे मुझे मंडप में अपने बेटे की जगह घड़े को ही क्यों न बिठाना पड़े, शादी तो उसी दिन उसी मुहूर्त पर होगी.’ मैंने हँसते हुए बताया.

‘घड़े से ...’ कार्तिक एकदम स्तब्ध! फिर राहत की सांस लेकर बोला, ‘अच्छा हुआ जो घड़े से तुम्हारी शादी नहीं हुई. वरना मैं आधा घड़ा-आधा आदमी पैदा होता. ज़रा सोचो मम्मा मैं कैसा दिखता.’

हमदोनों कार्तिक के उस रूप को imagine करके दिनभर खूब हँसे थे. 

आज फिर से हँस रहे थे. मैंने कुल्फ़ी का मटका कार्तिक के सर पर रखा और स्कूटी के आईने में दिखाया- देख कार्तिक तू कैसा दिखता! 

हमारी ये हरकतें देख लोग जो भी सोच रहे हों हमें तो उस दिन बहुत मज़ा आया.

अब मैं चली स्कूटी चलाने और आप गीत गाएं—यूँ ही बिन बात के छलकी जाए हँसी... 

(कहानी मेरी दोस्त शेफाली ने साझा की है.)


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