बात
तब की है जब साहिर लगभग ढ़ाई साल का था. मई का महीना था. हम सब शाम में पूर्वा दी
के यहाँ गए थे. वहाँ झुमकी दी, झुमकी दी की सास, B. K., मकरंद, शिउली और
अपूर्वानंद जी सभी थे.
हालांकि
हमारे पूरे परिवार को निमंत्रण था लेकिन चीफ़ गेस्ट तो साहिर थे.
पूर्व
दी का वोह वाला घर बड़ा ख़ास था. आगे में ‘टेरेस’, पीछे कमरे और उनसे लगी सीढ़ी, ऊपर
जाने के लिए. एक
कमरे में सभी बड़े बैठे थे, बाक़ी पूरे घर पर बच्चों का कब्ज़ा था. कोई साहिर को इधर
से बुलाता कोई उधर से. सभी उसकी बोली सुनने
को आतुर. साहिर की ज़ुबान तब भी काफ़ी साफ़ थी. बिना तुतलाए बोलता और उसके शब्दों का ख़ज़ाना
भी काफ़ी बड़ा था. सो सभी उसकी बातें सुनना चाहते थे.
‘साहिर...
बाबू... प्लीज़ इधर आओ न... थोड़ा खाओ न... इत्ते दिनों के बाद क्यों आए... जल्दी
क्यों नहीं आए...’ साहिर कुछ कहता फिर दूसरी ओर भागता. बड़ों की बातचीत भी उसी के
इर्दगिर्द होती रही. झुमकी दी की सास भी भागते-दौड़ते साहिर को रोक कर कुछ-कुछ
पूछतीं. मर्ज़ी साहिर की. कभी जवाब देता कभी भाग जाता.
साहिर
जितना दौड़ रहा था उससे ज़्यादा चिल्ला रहा था. वो कैसा चिल्लाता था यह समझाने के लिए
एक दूसरी कहानी बताना ज़रूरी है. उसी समय के आस पास हमलोग चित्रकूट गए थे. जिस जगह हम
ठहरे थे उसके आँगन में न जाने किस बात पर साहिर ने चीख़ना शुरू कर दिया. एक बच्चा
जो दस-बारह साल का रहा होगा पहले तो शांत खड़ा उसे देखता रहा फिर अपनी बहन को
पुकारने लगा - “बबली रे, जल्दी आ. देख-देख, बच्चा केत्ता जोर चीखता है.” उसकी बहन बबली दौड़ती
आई और दोनों बच्चे आँखें फाड़े, इत्ता चीखने वाले बच्चे का तमाशा बिना टिकट देखते
रहे.
पूर्वा
दी के यहाँ भी साहिर ने ख़ूब धमाल मचाया. जब चलने की बारी आई तब झुमकी दी की सास ने
साहिर से कहा, “बाबू, हमको भी मोटरसाइकिल पर ले चलोगे? हम बाबा के पीछे बैठ
जाएंगे. तुम मेरी गोदी में बैठ जाना.”
साहिर
ने दो टूक जवाब दिया, “नहीं.”
दादी
भी उस्तादों की उस्ताद! बोलीं, “नहीं ले चलोगे न तो दादी रोने लगेंगी.”
इतना
कहकर वो ख़ूब ज़ोर से रोने लगीं. बीच-बीच में साड़ी के आंचल से नाक भी पोछती जा रही
थीं. पल भर को तो मुझे भी लगा कि शायद बच्चे की ‘ना’ को उन्होंने अपने दिल पर ले
लिया है और सच में रो रही हैं.
साहिर
अवाक! एकदम चुप! अब क्या करे? कैसे कोई
बीच का रास्ता निकाले? न उनका दिल तोड़ना
चाह रहा था न उन्हें अपने साथ ले जा सकता था. एक मोटरसाइकिल, पहले ही तीन लोग थे.
अब इनको कहाँ बिठाए?
कुछ
पल बाद बोला, “हम अभी एक मिनट में आते हैं.” फिर मेरा और इश्तियाक़ का हाथ पकड़ा और
पूरी रफ़्तार से नीचे सीढ़ियों की तरफ़ भागा.
पीछे
से लोग आवाज़ देते रहे, ‘अरे नहीं जाएंगी, ज़रा ठहरो तो’ लेकिन साहिर कहाँ सुनने
वाला था. सीधा सटक सीधाराम!
पीछे
मुड़कर देखा तो दादी आंचल मुँह पर रखे हँसे जा रही थीं.
(यह
घटना 24.05.2008 की है)
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