पिछले
दिनों पीहू की कहानी सुनाई थी. अगर आप चूक गए हों तो ‘ सौ सुनार की’ पढ़ें. तीन साल की पीहू की इतनी कहानियाँ, इतने
क़िस्से हैं कि कहानियों के कई संग्रह निकाले जा सकते हैं. एक
झलक आज भी.
लगभग
दस दिनों पहले की बात है. तृप्ति से फ़ोन पर बात हो रही थी. पीहू तब उसके आस-पास ही
मंडरा रही थी. न जाने किस बात पर तृप्ति ने मुझे समझाते हुए कहा ‘मतलब कि...’. उसके
ऐसा कहते ही पीछे से पीहू की ज़ोरदार आवाज़ आई ‘ नईं, हमको मतलबी नईं बोलो.’ तृप्ति
ने तुरंत सफ़ाई दी, ‘नहीं भई! तुमको मतलबी कोई नहीं कह रहा है.’ उसके बाद पीहू ने
कोई सवाल नहीं किया. इधर मेरी हँसी फूट पड़ी थी. ‘मतलबी... मतलबी का मतलब मालूम भी
है इसको.’ तृप्ति भी अब मेरी हँसी के सुर में अपना सुर मिलाने लगी. हमें हँसने का
मौका मिला था और हम हँसे जा रहे थे.. बेतहाशा... अचानक पीहू की आवाज़ कानों में
पड़ी, ’पागल है!’
मैं और
ज़ोर से हँसने लगी. हँसते हुए पूछा, ‘क्या बोली?’
‘नीचे
लड़कियों का हॉस्टल है न. इसका चलता रहता है उन लोगों से. बोल रही होगी किसी को,’
तृप्ति ने हँसते हुए बताया. ‘इसको मानती भी बहुत है सब. परसों ही तो हमलोग आ रहे
थे कहीं से. सीढियां जब चढ़ने लगे तो ‘पीऊ-पीहू पुकारने लगीं. पीहू बिना लड़कियों की
ओर देखे आगे बढ़ने लगी. जब लड़कियों की पुकार थमी नहीं तो पीहू एक पल को रुकी और आँखें
मटकाते हुए बोली, ‘अभी हम बहुत ‘बीजी’ हैं.’ उनमें से जब किसी ने गंभीर स्वर में पूछा, ‘कहाँ बीजी हो
पीहू,’ तो एकदम स्टाइल में बोली, ‘हम अभी टाइमपास करने में बीजी हैं.’ उस समय रात
के दस-साढ़े दस बज रहे थे.’
‘कभी-कभी
तो ख़ूब सरिया के सुना देती हैं. अभी 2-4 दिन पहले की बात है. रिक्शे से हमलोग बाज़ार
जा रहे थे. तुम तो जानती ही हो इधर की सड़क और ट्रैफ़िक का हाल. सब पहुँचने की हड़बड़ी
में ही रहता है...इतनी पतली गली है उसमें भी धीरज नहीं है किसी को. अरे भई, जगह
होगी तब तो आगे निकलोगे? नहीं तो ठोकते रहो सबको. या फिर ठोकाते रहो. उस दिन एक
स्कूटर वाला हमारे रिक्शे को धक्का मारते हुए आगे निकल गया. रिक्शेवाले को ग़ुस्सा
आया. उसने बोलना शुरू किया, ‘देख के चलईबे न करता सब. देखेगा ओन्ने आ चलेगा
एन्ने.’ बेचारा और कर भी क्या सकता था! इतना बोल कर झुंझलाता हुआ धीमी चाल से रिक्शा
चलाते हुए आगे बढ़ने लगा. सड़क पर भीड़ इतनी थी कि स्कूटर वाला धक्का देने के बावजूद
बहुत दूर नहीं निकल पाया था. हमारा रिक्शा जैसे ही उसके पास पहुँचा, दिया पीहू ने
सरिया के. स्कूटर वाले को तरेरते हुए बोली, ‘एकदम बुद्धू है? देख के नईं चल सकते? अभी चोट लग जाती तो?’ स्कूटर वाला कोई भला मानुष रहा होगा, इतनी छोटी बच्ची से डांट खाकर चुपचाप आगे निकल
गया... हम अनुमान लगाते रहे कि उसे शर्मिंदगी हुई होगी!’ तृप्ति ने दूसरा क़िस्सा
सुनाया.
फिर
से हँसी का दौर चल पड़ा. पीहू आस-पास ही मंडरा रही थी. अपनी उपस्थिति हर बार अगल
तरीक़े से दर्ज करा रही थी. इस बार उसने कहा, ‘टॉफ़ी दो.’
‘हम
ज़रा दो मिनट बात कर लें? उसके बाद चलते हैं कमरे में और देते हैं टॉफ़ी.’ मुझे
तृप्ति की आवाज़ आज्ञाकारी माँ की तरह लगी.
‘कितनी
बार तो अपनी बात से घर का ‘मूड’ बदल देती है . कोई कितना भी सीरियस रहे, कितना भी
ग़ुस्सा रहे एक बार हँस ही देता है. कल रात के ग्यारह बजे इसने declare किया, ‘पॉटी
आई है.’ जाड़े में रात के ग्यारह बजे रज़ाई से
निकलने की हिम्मत नहीं होती है. मगर निकलना तो था. सो निकले. उसे बिठाया. फिर पानी
गरम किया. ठंढ की वजह से कान और मुँह सब शॉल से लपेटे हुए थे. जल्दी ही पता चल गया
कि ऐसे वातावरण में नाक को भी लपेट लेना है और कुछ बोलना नहीं है. सो नाक भी शॉल
के अन्दर छुपाए और चुपचाप पहुँच गए मैडम जी के पास. जाड़े की रात और रात का
सन्नाटा... और मेरी ख़ामोशी. पीहू मेरी चुप्पी का राज़ समझना चाह रही थी. अपने
आप जब नहीं समझ पाई तो पूछ
बैठी, ‘इतना सीरियस होके क्यों धुला रही हो?’
इतना बता कर तृप्ति हँसने लगी. हम दोनों ख़ूब मतलब ख़ूब हँसे. अंत में तृप्ति ने कहा, ‘चलो जी, उसको चॉकलेट निकाल कर देना है नहीं तो...’ अपनी अधूरी बात के साथ तृप्ति फिर से हँसने लगी. हँसते हुए बोली, ‘चॉकलेट देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. पीहू बड़ा वाला डब्बा निकाल चुकी है... वही वाला जो उसे लेने से मना किया था.’
हम
दोनों फिर से हँसने लगे. कितना अच्छा लग रहा था ! हम उस पल को जी रहे थे.
दूर
कहीं गाना बज रहा था, ‘हर तरफ़ तेरा जलवा... हर तरफ़ तेरा जलवा.’
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