Tuesday, November 3, 2015

परीक्षा का बुख़ार


मुझे याद है अक्टूबर का महीना था. पापा का ट्रांसफर बेतिया हुआ था. तब मैं चौथी क्लास में थी. पापा को मेरे लिए नए स्कूल की तलाश थी. बहुत पूछ-ताछ के बाद उन्होंने मेरे लिए एक ‘बढ़िया’ स्कूल चुना था. अब तक स्कूल में मेरा दाख़िला ऐसे ही होता रहा था, यानी कोई परीक्षा दिए बगैर. मगर यह स्कूल बेतिया का नामी-गिरामी स्कूल था. यहाँ बिना परीक्षा पास किए दाख़िला नहीं होता था. परीक्षा में चार विषय अनिवार्य थे- संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेज़ी और गणित. दिसम्बर के आख़िरी हफ़्ते में परीक्षा होनी थी. पास होने पर मैं जनवरी से पाँचवी क्लास में बैठ सकती थी.

संस्कृत और हिन्दी से तो मुझे कोई डर नहीं था. पर अंग्रेज़ी और गणित मेरे लिए विशालकाय राक्षस थे. उनके नाम से ही मेरे हाथ पैर फूलने लगते थे. दाख़िला उसी स्कूल में करना था. सो परीक्षा भी देनी ही थी.

परीक्षा मेरे लिए कब ‘राक्षस-राक्षसी’ ‘चुड़ैल-‘चंडाल’ और ‘भूत प्रेत’ में बदली ये मैं आज तक समझ नहीं पाई हूँ. तब तो बहुत छोटी थी. परीक्षा के बारे में सोच-सोच मैं चिंतामणि बनने लगी. सोते-जागते दिमाग़ में यही बात रहती - ‘अगर मैं फ़ेल हो गई तो! अगर मेरा दाख़िला न हुआ तो! लोग चिढ़ायेंगे तब क्या बोलूँगी!’ बुरे ख़याल हर वक़्त मन को घेरे रहते. पढ़ने बैठती तो दिल धकधक करता. सोती तो इन विषयों के डरावने सपने आते. कोई पूछ दे कि परीक्षा की तैयारी कैसी चल रही है तो ऊपर से नीचे तक काँप जाती.

इस हाल में मुझे अपना सहारा आप बनना था. मैं चुप कैसे बैठ सकती थी? मैंने कुछ तय किया.

जाड़े का समय था. मैं सुबह-सुबह बिना गरम कपड़ों के घूमने लगी. सोचती थी ठंड लगेगी तो बुख़ार आ ही जाएगा. मगर माँ जब उस हाल में देखती तो एक के बदले दो स्वेटर पहना देती. सो यह तरकीब चल नहीं पाई.

तब मैंने हनुमान मंत्र का जाप करना शुरू किया- ‘महावीर जब नाम सुनावे भूत पिशाच निकट नहीं आवे.. जय हनुमान ज्ञान गुण सागर...’. मगर हनुमान जी ने विकट परिस्थिति में ला खड़ा किया. कहाँ तो उन्हें परीक्षा को दूर करना था पर वे उसे और पास ले आए.

तीन दिन बाद परीक्षा थी. अब या तो भूकंप आता या बाढ़ आती तभी मैं इस अज़ाब से बच सकती थी. लेकिन मेरे चाहने के बावजूद ऐसा नहीं हुआ.

मेरे पास ‘ब्रह्मास्त्र’ छोड़ने के अलावा कोई उपाय नहीं था. रात में सबके सो जाने के बाद मैंने रसोई से चुपके से एक प्याज़ निकाली. धड़कते दिल से उसे छीला-काटा. सभी भगवानों को याद किया और फिर टुकड़े को अपनी काँख में दबाकर सो गई. एक भगवान से वादा भी कर डाला कि अगर वे मुझे बुख़ार दिला देंगें तो मैं दुबारा उनसे कुछ नहीं माँगूंगी.

माँ दुर्गा का मंदिर पास में था. उनपर मेरी विशेष भक्ति चढ़ी थी. जब भी मंदिर की घंटी बजती मेरे दिल में उनका नाम बजता था.

आख़िर ऐसे भक्त को भगवान छोड़ कैसे सकते थे! तीसरे दिन यानी परीक्षा वाले दिन सभी भगवानों ने मिलकर मेरी मुराद पूरी कर दी.

उस दिन जब सोकर उठी तब सर में हल्का दर्द था. माथा छूकर देखा तो गरम था. मैंने चहक कर पुकारा, ‘माँsss माँsss बुख़ार हो गया है.’ माँ भागती हुई आई और मेरा तपता हुआ माथा छू जल्दी से थर्मामीटर लगाया. बुख़ार था... 103 डिग्री. माँ परेशान हो रही थी और मेरे मन में पटाखे फूट रहे थे. भगवानों पर मेरी श्रद्धा एकबारगी बढ़ गई थी. मगर पिक्चर अभी बाक़ी थी मेरे दोस्त!

माँ ने घड़ी देखी. परीक्षा शुरू होने में दो घंटे बचे थे. उसने पीने को गरम दूध दिया. फिर ‘क्रोसीन’ खिलाया. अब उसे इंतज़ार था बुख़ार उतरने का. उस वक़्त मेरे लिए यह कल्पना से परे था कि इतना ज़्यादा बुख़ार जल्दी से उतर भी सकता है!  दो घंटे बाद बुख़ार 2 डिग्री उतर गया. माँ ने कहा, ‘चलो अब परीक्षा दे दो.’ उसने अच्छे से गरम कपड़ा पहनाया और ले चली स्कूल की ओर.  

स्कूल में उसने प्रिंसिपल से बात की. मेरी हालत बताई. प्रिंसिपल ने मेरा माथा छूकर देखा. उन्होंने कहा, ‘थोड़ा तो है. तुम आधा घंटा टाइम ज़्यादा ले लेना.’ उनकी असिस्टेंट मुझे सहारा देती हुई एग्ज़ामिनेशन हॉल तक ले गईं.

संस्कृत और हिन्दी का पर्चा लिखने तक मेरी तबीयत ठीक रही. अंग्रेज़ी का पर्चा देखते ही मुझे चक्कर आने लगे. मैंने अपना माथा छूकर देखा. पहले से ज़्यादा गरम हो रहा था. मैं अपनी जगह से उठी और लड़खड़ाती आवाज़ में बोली, ‘बुख़ार बढ़ रहा है.’

मुझे फ़ौरन प्रिंसिपल के कमरे में पहुँचा दिया गया. प्रिंसिपल को मेरे बुख़ार में सच्चाई दिखने लगी थी. उन्होंने कैंटीन से मेरे लिए गरम चाय मंगवाई और बिस्कुट भी. सर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, ‘थोड़ा आराम कर लो. फिर देना ‘एक्ज़ाम.’
उनकी आख़िरी बात सुन शरीर-दिमाग़ सब सुन्न पड़ गए. मैं ‘नहीं हो पाएगा’ कहती हुई पास की कुर्सी पर लुढ़क गई. बुख़ार तेज़ी से बढ़ने लगा.

मेरी हालत देख उन्होंने मुझे घर भेज दिया. न जाने कैसे घर पहुँचते ही मेरा बुख़ार 98 डिग्री पर आ गया था.

माँ नाराज़ भी थी और उसे अफ़सोस भी था कि मेरा दाख़िला वहाँ न हो पाएगा.

मगर एक जादू हुआ—हिन्दी और संस्कृत में ‘अच्छा’ करने के आधार पर स्कूल वालों ने मुझे ले लिया. आख़िर बुख़ार में भी परीक्षा देने वाली एक मेधावी छात्रा से वे अपने स्कूल को वंचित कैसे कर सकते थे!

अब सोचती हूँ तो लगता है कि जितनी मेहनत मैंने बुख़ार लाने के लिए की थी उतनी अगर परीक्षा की तैयारी में की होती तो बेहतर होता...

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