Saturday, October 24, 2015

ननिहाल से


हाथ छुड़ावत जात हो निर्बल जान के मोहे
ह्रदय में से जाओ तो तब मैं जानूँ तोहे‘
... नानी! आज ये गाना सुनते हुए मुझे नानी की बहुत याद आ रही है. अभी एक साल पहले नानी का साथ छूट गया. नानी का शरीर हमारे बीच नहीं... लेकिन मन... मुझे लगता है अभी भी हमारे बीच है! ननिहाल से जुड़े कई क़िस्से याद आ रहे हैं.

देवघर के पास मेरी ननिहाल है. हम अक्सर वहाँ छुट्टियों में जाया करते. भरा पूरा घर – लोगों से और पेड़ों से. हम सब भाई-बहन बन्दर-बंदरियों की तरह पेड़ों पर उछलते. एक से दूसरे पेड़, दूसरे से तीसरे फिर चौथे... अनगिनत पेड़ों पर हम चढ़ते. थककर वहीं पेड़ों की छाँव में चटाई बिछाकर आराम फ़रमाते. हाथ में होती एक किताब और बग़ल में अमियाँ और नमक.

रात में मैं बंदरिया की तरह ही नानी के सीने से चिपक कर सोती. नानी बालों में हाथ फेरतीं और थपकती हुई गातीं—‘महलों का राजा मिला कि रोज़ी बेटी राज करे...’ नानी की आवाज़ में न जाने क्या जादू था! वे हाथ मेरे बालों में फेरती थीं और थकान पूरे बदन से ग़ायब हो जाती थी.

गाने में नानी क्या, नाना, मामा सब एक से बढ़कर एक थे. सभी सहगल के घनघोर पुजारी थे. हमें गणित का पहाड़ा कम याद कराया गया, सहगल के गीत ज़्यादा. ‘ग़म दिए मुस्तक़िल’, ‘एक बंगला बने न्यारा’, ‘बाबुल मोरा नईहर छूटो ही जाए,’ और ‘सोजा राजकुमारी’ हमें आज भी कंठस्थ हैं... हम गाते-गाते खाते और खाते-खाते गाते. बचपन में मुझे अंदाज़ा होता था कि मैं सहगल ख़ानदान से हूँ. नानीघर जाकर ये विश्वास और बढ़ जाता था. कोई तान छेड़ दे तो बैठका जम जाता और अगर बैठे हैं तो तान छिड़ ही जाती थी. हमारा सामूहिक भजन था, ‘एक बंगला बने न्यारा.’

नानी जितना बढ़िया गाती थीं उतना ही बढ़िया खाना बनाती थीं. शाम में वे अक्सर घुघनी बनातीं. उसे मूढ़ी के साथ बड़े प्यार से केले के पत्ते पर परोसतीं. हम सब कचर-कचर कर के खाते.

एक दिन घर में नमक ख़तम था. नानी ने मेरे छोटे भाई सोनू को जो तब 5-6 साल का था, बुलाया और कहा, ‘ज़रा जाके टुलटुल (मामा) से कहो कि बेंगा की दूकान से नमक ले आए.’  सोनू नानी के सामने तो कुछ नहीं बोला लेकिन मामा के पास जाकर बोला, ‘नानी बोल रही हैं कि मेंढ़क की दूकान से नमक ले आओ.’

“किसकी दुकान से?” मामा ने पूछा.

“मेंढक की दुकान से.”

सोनू की बात सुन मामा हँसने लगे. बोले, ‘यहाँ मेंढ़क नहीं बेंगा की दूकान है.’

सोनू ने ज़रा ग़ुस्से में ही कहा, ‘नहीं उसका असली नाम मेंढ़क है, बेंगा नहीं.’

‘असली नाम’ सुनकर मामा सोच में पड़ गए. बेंगा का असली नाम हममें से किसी को भी नहीं मालूम था. दरअसल गाँव के कुछ लोगों को उसका चेहरा ‘बेंग’ की तरह लगता था. कब किसने उसे इस नाम से पुकारना शुरू कर दिया और कब बेंगा ने अपने इस नाम को स्वीकार कर लिया नहीं मालूम.

सोनू को यह बात अच्छी नहीं लगती थी कि कोई उस दुकानदार को ‘बेंगा’ बुलाए. उसे लगता कि उसका असली नाम ‘मेंढ़क’ है और लोग उसे बिगाड़कर ‘बेंगा’ पुकारते हैं. साथ ही उसे यह भी लगता कि असभ्य और अशिष्ट लोग की भाषा में ‘बेंग’ होता है ... सभ्य और शिष्ट  लोगों की भाषा में ‘मेंढ़क.’

सभ्य और शिष्ट!


नानी अब हमारे बीच नहीं हैं पर साथ नहीं छूटा! नानी की मौत के ठीक एक महीने बाद सोनू की बेटी का जन्म हुआ. चेहरे-मोहरे से हू-ब-हू नानी!

(यह क़िस्सा मेरी दोस्त स्निग्धा ने साझा किया है)

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