इधर फुफ्फू अपनी जुड़वां भतीजियों के किस्से सुना रही हैं और
उधर मेरे दिल में चल रहा है काश! मैं इनके दिल में उतर जाऊं और फिर वो सब कुछ अपने दिल में भर लूं जो इनके दिल में हैं. मुझे वो कभी-कभी हनुमान की तरह दिखने लगती हैं
जो सीना चीर कर दिखा रही हों कि देखो मेरे हृदय में रूमी और राबिया बसती हैं!
जितनी देर हमने बात की उसमें से आधे से ज़्यादा वक़्त तो
उन्होंने इन्हीं दोनों का किस्सा सुनाया.
‘ये जो दो फ़रिश्ते हमारे घर में हैं ये तो अल्लाह की नेमत
हैं! इनके बारे में मैं क्या बताऊँ...’ फुफ्फू की आँखों में चमक है और चेहरा गुलाब
की तरह खिला हुआ.
‘इस बार जो दोनों अपनी नानी के यहाँ से आईं तो ज़बान पर
बिहारी तड़का चढ़ा लाईं. एक दूसरी से पूछ रही थी,’ चेलेगी रे! सनीमा देखे चलेगी?’
कित्ते प्यार से फुफ्फू बता रही हैं और साथ में हँसती भी जा रही हैं. ‘और इनकी
बोली सुनकर इनके अब्बा का तो मत पूछिए! मुँह
से कुछ नहीं कह रहे मगर उनकी देह का एक-एक रोआं यही कह रहा है, देखा ! मेरी
संस्कारी बच्चियों ने अपनी जड़ को कैसे पकड़ा है!’ मैं इनके अब्बा को गदगद होते इमैजिन
करने लगती हूँ. इमैजिनेशन भंग होता है तो सामने गदगद फुफ्फू हैं.
कुछ बातें मैं मिस कर गई हूँ और वे जो बता रही हैं उसी से
मैं टोह ले रही हूँ. वे ’मियाँ-मियाँ’ करके कुछ कह रही हैं. मैं अपनी जानकारी के
सारे दरवाज़े खोलती हूँ और गहरी सोच में हूँ कि आख़िर ‘मियाँ’ का इस्तेमाल छोटे
बच्चे किनके लिए करते हैं. नहीं समझ पाती तो पूछ बैठती हूँ, ‘मियाँ?’ ‘समीरा उनके
लिए बोलना मुश्किल था ना तो वे मुझे मियाँ बुलाने लगीं... तो मियाँ मैं हूँ.’
फुफ्फू अपने नए नाम पर चहक रही हैं. ये नाम जो उनकी लाड़लियों ने रखा है.
‘यही मियाँ क्रिसमस के समय उनकी सैंटा बन जाती है. वे कान
में इस ‘सैंटा मियाँ’ को बता देती हैं कि
इस क्रिसमस उनको क्या चाहिए. बस बताते समय इनकी आँखें मुस्तैद रहती हैं कि आस- पास
अम्मी-अब्बा न हों. न न... चमाट पड़ती नहीं बस नाम ही काफ़ी होता है.’
‘और पिछली बार पता है क्या हुआ! एअरपोर्ट से उनके घर
पहुँचते -पहुँचते रात के साढ़े ग्यारह बज गए थे. सब के सब जगे थे. मेरे स्वागत में
ऐसी -ऐसी चीज़ें रखी थीं जिन्हें देख मेरा दिमाग़ चक्करबाज़ी खा रहा था. कॉपी- कलम, झाडू,
बेलन, दोनों बच्चियों के जूते-चप्पल और जूते चप्पल-सा असर करने वाली कुछ और चीज़ें एकदम
से सामने रखी हुईं थी. ये दोनों भी वहीं सहमी सी खड़ी थीं. मैं कुछ पूछती- समझती
इसके पहले ही इनके अब्बा गब्बर सिंह के अंदाज़ में बोलने लगे, ‘ रूमी और राबिया से
ये बात पहले ही हो गई थी कि ये जिस भी चीज़ से अपनी बहन को मारेंगी उसी सब से मैं
भी अपनी बहन को मारूँगा. सो अब एक-एक करके इन सारी चीज़ों से मैं तुम्हें मारूँगा.’
‘शर्त ये पहले से जानती थीं. लेकिन सच्ची में ऐसा होते देख
इनके तो फ़ाख़्ते उड़ने लगे. अपनी फुफ्फू को बचाने के लिए वे एकदम सनीमा वाले अंदाज़
में चीख़ने लगीं, ‘ नहीं कलेंगें. अब कभी नहीं कलेंगें अब्बा. मियाँ को मत मालो....
प्लीज!’’ फुफ्फू भी एकदम सनीमा के अंदाज़ में क़िस्सा सुना रही थीं.
‘मैं भी कम नहीं हूँ ना. मैं भी इनको छेड़ती हूँ . कहती
हूँ कि तुम्हारे अब्बा तो बोर्ड रंगने वाले
पेंटर हैं तो दोनों छुटकी लड़ जाती हैं मुझसे. कहती हैं, ’हमाले अब्बा आलटिस्ट हैं.
जो पेंटिंग करता है वो आलटिस्ट होता है.’
‘कैसे गिलहरी ख़रगोश की तरह उछलती हैं घर में. ख़ुद तो उछलती ही
हैं हमें भी अपने जैसा बना लेती हैं. इनकी झप्पी सच्ची में जादू की झप्पी है. हम
सारे ग़म भूल जाते हैं. अपनी मर्ज़ी से इनके
ग़ुलाम बन जाते हैं. वे कहती हैं ‘घोला बन जाओ’, हम बन जाते हैं. कहती हैं ‘पकलो पकलो’ हम पकड़ने लगते हैं. कहती
हैं ‘दीवाल पल ड्राइंग कला दो’ हम पेंट का डब्बा ले हाज़िर हो जाते हैं. और जब सर्फ़
के झाग में डूबी नन्हीं हथेलिओं को दिखा कर उसका साइंटिफिक नाम ( जो मेरी ज़बान पर
चढ़ता ही नहीं) बताती हैं तो हम हैरानी से ताकते रह जाते हैं. ये हमारी आइन्स्टाइन भी
हैं. हमारा बचपन, हमारा सुकून हैं.’
फुफ्फू पाँच साल की रूमी और राबिया का किस्सा सुना रही हैं और उनकी एक-एक चीज़ मेरे अन्दर उतर रही है. उनके
बोलने का अंदाज़, उनके शब्दों का चुनाव, उनकी मुस्कराहट, उनकी मोहब्बत... मैं कभी
बच्चियों में खो रही हूँ तो कभी फुफ्फू में. मैं गुलाब सी ख़ुशबू अपने आसपास महसूस करती
हूँ और फिर ज़ोर से साँस लेकर अपने अन्दर भरने लगती हूँ. हाँ! ऐसी ही मोहब्बत मुझे
अपने अन्दर चाहिए !
प्रेम की बेहद सहज अभिव्यक्ति! जिसे प्रेम समझ आता है वही इतनी सहजता से बता सकता है.
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