11.30 बजे
'मम्मा मैं ख़ुद 12.30 में
पढने बैठ जाऊंगा.'
12 बजे
'बस एक मिनट के लिए फ़ोन
लिया है. आदित्य से पूछना है कि आज स्कूल में क्या हुआ?'
12.10
'क्या खाने को कुछ मिल
सकता है? क्या नमकीन और बिस्कुट खा लूँ?'
12.30 ट्रिंग ट्रिंग
'मम्मा तुम्हारा फ़ोन...
क्या उतनी देर मैं ज़रा कंप्यूटर देख लूँ?'
एक बजे
'क्या खाना तैयार है?'
1.10 बजे युद्ध का बिगुल.
1.15 शान्ति वार्ता
'इतना गुस्सा होने की बात
ही नहीं है.. मेरा होमवर्क अभी हो जाएगा.'
1.30 भोजन
भोजनोपरांत
'क्या केंट वाले का नंबर
मिल गया? ठहरो, मैं ढूंढता हूँ...'
1.45 माँ के स्वर में
क्रोध की ज्वाला
'मम्मा बस तुम मेरे साथ
बैठ जाओ... मेरा होमवर्क अभी हो जाएगा.. अच्छा गुस्सा मत हो मैं ही तुम्हारे पास
आता हूँ...'
2.00 बजे
'साइंस प्रोजेक्ट के लिए
बस दो मिनट के लिए इन्टरनेट की ज़रुरत है...'
2.15
'बस मैं फ़ोन रख ही रहा
हूँ... एक बहुत interesting बात पता चली है... जब इंसान गुस्सा होता है तो उसका
खाना अच्छे से नहीं पचता है... क्या तुम्हें ये पता है?'
2.30
इमोशनल ब्लैकमेलिंग की
पराकाष्ठा
‘तुम ऐसा क्यों नहीं
समझते कि आज तुम्हारी मम्मा का आख़िरी दिन है.. इसे बहाने तो पढ़ लो.’
‘तब तो पढाई बिलकुल नहीं
होगी.’
‘क्यों?’
‘तुम्हीं बताओ अगर ये
आख़िरी दिन है तो क्या कोई बच्चा पढाई कर सकता है?’
‘तो?’
‘आज तो पूरा टाइम तुम्हारे
पास रहना चाहूँगा और तुम्हें ख़ुश करना चाहूँगा... क्या तुमने वो गाना सुना है...
ज़िन्दगी एक सफ़र है सुहाना यहाँ कल क्या हो किसने जाना....’
3.00 बजे सभा की समाप्ति.
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