कल
से पतिदेव दिल्ली में हैं. अभी तक मेरा मन इस शहर में नहीं रमा है! ईमानदारी से
कहूँ तो मेरा दिमाग़ पगलाया हुआ है. कारण – कभी बेरोज़गारी, कभी ये शहर, कभी ये बात,
कभी वो बात. वैसे मुझे जाननेवाले अच्छी तरह जानते हैं कि पगलाने के लिए मैं किसी
कारण की मोहताज नहीं हूँ.
मेरा
ग़ुस्सा कई बार भोली पर उतरता है जो कि ठीक बात नहीं है. भोली मेरी छह साल की बेटी
है. दो-तीन बड़ी शिकायतें हैं उससे—लिखना नहीं चाहती, ब्रश ख़ुद नहीं करती, ख़ुद से
नहीं खाती और सबसे बड़ी शिकायत कि पॉटी ख़ुद नहीं धोती. मेरा ग़ुस्सा उसे मालूम है
इसलिए आज मेरे चेहरे पर भावों का विस्तार देख उसने आज अपने से ब्रश भी किया और
नाश्ता भी.
पर
सुबह से ही तना-तनी है. कारण- छह–सात लाइन लिखने को क्या कह दिया उसे तो नानी-परनानी
सब याद आ गई. मैंने उसे पैर पर चटाचट दिया और गाल पर मारने की धमकी दे डाली. मैंने
मारा तो बदले में उसने भी मुझे मारा. उसकी मार ने मेरे बड़े होने के घमंड को हिला
दिया और ग़ुस्से में मैंने उसकी किताब ज़मीन पर फेंक दी. क़िताब मैंने फेंक तो दी मगर
अब ग़लती करने का अहसास मुझ पर हावी हो गया. उधर वो बैठी रोती रही और इधर मैं.
थोड़ी
देर बाद मैंने कहा – ‘मुझे तुम्हें मारना बिलकुल अच्छा नहीं लगता.’ उसने कहा, -‘
मत रोओ मम्मा. मुझे भी तुम्हें मारना अच्छा नहीं लगता.’ फिर उसने मेरे आँसू पोंछे
और मैंने उसके.
दोस्ती
हो चुकी थी. फिर क्या था! उसने मौका देख कर मारा चौका और जा बैठी कंप्यूटर पर. बस
दो मिनट-दो मिनट कहते-कहते उसने चार घंटे कंप्यूटर पर बिता दिए. अब फिर से मेरा
पारा सातवें आसमान पर था. खाना उसके सामने रखा और धमकी दी - ‘हर हाल में पूरा ख़त्म
करना है.’ घंटा भर होने को था और उसने केवल एक रोटी खाई थी. कुछ भयंकर होने की
आशंका में मेरी ओर देख कर वो रोने लगी और कहने लगी, ‘दांत में बहुत दर्द है. सच
में मम्मा, बहुत दर्द है.’ मैंने उसे ब्रश करने की सलाह दी. उसने ऐसा ही
किया. फिर दांत के नीचे उसने लौंग दबाया. और
देखते ही देखते ही दर्द ग़ायब हो गया.
शाम
होने को थी. अब मेरा पूरा ध्यान उसके होमवर्क पर था. मैंने कहा, ‘ चलो पढ़ते हैं.’
उसने बड़े भोलेपन से कहा- ‘आज भोली को ड्राइंग करने का मन है. मम्मा तुम इधर सामने
बैठो आज मैं तुम्हारी फोटो बनाउंगी.’ मैं
जैसे उसकी बात सुन ही नहीं पा रही थी. जैसे मेरे कान उसकी बात रजिस्टर ही नहीं कर
रहे थे. मेरा पूरा ध्यान उसके होमवर्क और
होमवर्क न होने की स्थिति में टीचर से मिलने वाले रिमार्क पर था. मेरे दिमाग़ में
मानो उसकी कॉपी दौड़ रही थी जिस पर लाल कलम से लिखा हो ‘अभिभावक, बच्चे पर ध्यान
दें.’
वो
मुझसे बार-बार बैठने की मिन्नत करती रही और मैं भावशून्य हो उसे देखती रही. इतने
में उसे पॉटी लग गई. बाथरूम स्लिपर्स पहन वो ये कहती हुई दौड़ी, ‘मम्मा धुला देना.’
उसी
भावशून्यता में मैंने कहा- नहीं धुलाउंगी.’
‘मम्मा
प्लीज़!’
‘नहीं
धुलाउंगी!’ मैंने कहा, ‘ पहले तुम कोशिश करो फिर मैं धुलाउंगी.’
वो
बाथरूम की तरफ़ दौड़ी. जल्दी ही उसने आवाज़ लगाई, ‘ मम्माsss’
मैं
दरवाज़े की तरफ़ गई और मैंने कहा, ‘ आज तो मैं बिलकुल ही नहीं धुलाउंगी’
उसने
बहुत मासूमियत से दिखाया, ‘ देखो मेरा हाथ भी नहीं पहुँच रहा. मुझसे तो मग भी नहीं
उठ रहा.’
‘मग
का आधा पानी गिरा दो.’ मैंने सुझाया.
‘मम्मा
मेरा हाथ अभी भी नहीं पहुँच रहा.’ वो अपने बाएं हाथ को सामने से घुमाती हुई अपनी
पीठ छूकर दिखाने लगी.
मैं
अपनी बात पर अड़ी थी मगर इस बार कुछ नरमी से कहा, ‘अगर तुम कोशिश नहीं करोगी तो मैं
नहीं धुलाउंगी.’
उसने
हँसकर कहा, ‘असल में ये काम मुझे...’ इतना कह कर वो रुक गई.
‘नहीं
पसंद. वाहsss ! मुझे भी दूसरे की पॉटी धोना नहीं पसंद.’ मैंने भी हँसकर कहा.
इस
बार उसने कोशिश की और पॉटी की धुलाई कर डाली. मैंने चेक किया तो उसने सच में अच्छे
से साफ़ कर लिया था.
भोली
हँसती हुई अपनी पैंट उठाकर भागी और बोली, ‘पहले से आता था मम्मा, बस तुमलोग को
बुद्धू बनाती थी.’
पुनश्च-
नाम और पात्र छुपा दिए गए हैं लेकिन कहानी काल्पनिक नहीं है.
Too good Swati...enjoyed
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