किसी
जादूगरी से कम है क्या कि धरती में बीज डाला और पेड़-पौधों की आतिशबाज़ी शुरू हो गई!
पेड़-पौधे भी कैसे कैसे! उनमें भरा हरा भी
कैसा-कैसा! सतरंगी, मख़मली, मुलायम, जादुई, रौशन...
मुझे
हरा रंग बहुत पसंद है. बल्कि हमारे घर में सभी को हरा बहुत पसंद है. दो महीने पहले
अगर आप हमारे घर आते तो आपको घर के बाहर ही हरा परदा मिलता, फलदार-फूलदार परदा. नीचे
से ऊपर तक तुरई के लत्तर में झिलमिलाता हमारा घर हमारी पहचान बन गया था. तुरई ने
लोगों को तो ललचाया ही चिड़ियों और गिलहरियों को भी ख़ूब लुभाया. फिर तो सुबह से शाम
तक संगीत ही संगीत...चुइं... चुइं...टिटिक... टिक..., चुइं... चुइं... टिटिक...
टिक..., चुइं... चुइं... टिटिक... टिक...बीच-बीच में उनकी कलाबाज़ी और करतब का
आनंद! गिलहरियों ने तो पूरा सर्कस दिखाया. कभी सत-बहिनी चिड़ियों से लड़तीं, उन्हें धमकातीं,
कभी धमक कर ख़ुद ही पीछे हट जातीं. कभी चारदीवारी पर सरपट दौड़तीं मानो छुआछुई खेल
रही हों, कभी दौड़ते-दौड़ते पट से लंबलेट हो जातीं मानो कह रही हों ‘अभी ब्रेक’. कभी
बाएं पंजे से दाहिनी पीठ को खुजातीं तो कभी दाएं से बाईं को. कभी ऐसे तन कर बैठतीं
मानो अपनी धारियों पर इतरा रही हों. कभी तो लगता जैसे ताल ठोक कर कह रही हों ‘फूल-
फल सब हमारा है’, कभी लगता कह रही हों, ‘इस हरियाली को भी तुमसे प्यार है.’ उस पल
मैं गदगद हो उठती.
मैंने
अपने बैठके में भी हरे रंग का, घास वाले हरे रंग का परदा लगाया है, जिसे देख आप भी
पाश की पंक्तियाँ दोहराने को मजबूर हो जा सकते हैं,
‘मैं
घास हूँ मैं अपना काम करूँगा
मैं
आपके हर किए धरे पर उग आऊंगा’
ये
कमरा हम दोस्तों का अड्डा है. मौसम का मिजाज़ गड़बड़ होने पर या अपना मन होने पर इसी
कमरे में साहिर अपने दोस्तों के साथ खेलता है. इस कमरे की एक और ख़ास बात है. इसका एक
हरा परदा खनकता भी है. इसे खनक देता है परदे के साथ गलबहियाँ करता ‘विंड चाइम’. बच्चे
इसे ‘घंटी’ कहते हैं और गाहे बगाहे टुनटुनाते भी हैं.
बेंत
की कुर्सियों पर भी हरे रंग का, तरबूज़े वाले हरे रंग का कवर चढ़ाया है. अंतर इतना
ही है कि इसे फाड़ने पर अन्दर से तरबूज़ की तरह लाल नहीं सफ़ेद रंग निकलता है.
इसके
अलावा हरा कुर्ता, हरी साड़ी, हरा जैकेट, हरा बैग, हरी चादर, हरे नग का झुमका, हरा
बाला, हरे ढक्कन वाला डब्बा और हरा कप भी है. यानी घर के अन्दर भी हरियाली ख़ूब है.
आज
काफ़ी देर से साहिर और उसका एक दोस्त हमारे बैठके में खेल रहे थे. साहिर जब खेलकर
घर में घुसा तब वो भी मुझे एक नन्हा पौधा लग रहा था – थोड़ा मौलाया-सा. उसने मुझसे
कोई बात नहीं की. मैंने भी नहीं छेड़ा. थोड़ी देर बाद उसने ख़ुद ही बताया, ‘मम्मा
चिक्स आज कुछ अजीब कह रहा था... चिढ़ाते हुए कह रहा था, यार ये मुसलमानों को हरा
रंग इतना पसंद क्यों है?’
साहिर
ये क्या बता रहा था! तो बच्चों में भी ये बीमारी पहुँच चुकी है! ‘तो तुमने क्या
कहा?’ मैं इतना ही पूछ पाई.
‘कुछ
भी नहीं, बस इतना ही...‘चिक्सsss क्या कह रहे हो?’ साहिर ने उदास होकर कहा. पलभर
रूककर बोला ‘इस रंग से लोगों को इतनी परेशनी है तो इसे तिरंगे झंडे से निकाल क्यों
नहीं देते? निकाल ही दें...’ साहिर की आवाज़ में बेचैनी और ग़ुस्सा था. मेरे लिए भी
ऐसा सुनना बहुत तकलीफ़देह हो रहा था.
थोड़ी
देर तक कमरे में चुप्पी छाई रही.
‘अगर
धर्म से रंग का कोई जुड़ाव है और हरा मुसलमानों का रंग है तब तो भिन्डी, कद्दू,
पालक, करेला, मेथी, मटर... सबके सब मुसलमान हुए...’ मैंने कहना शुरू किया.
साहिर
के ठहाके से कमरा गूँज उठा.
‘फिर
तो बीन्स, सेम, शिमला मिर्च, सेब, केला, तरबूज़, मिर्ची सब मुसलमान हैं... अरे नहीं,
इनमें से कुछ हैं जो बड़े होकर अपना धर्म बदल लेते हैं. मिर्ची, टमाटर और सेब शुरू
में मुसलमान हैं. बाद में वे बग़ावत कर देते हैं और हिन्दू हो जाते हैं...लेकिन
डार्क रेड पर तो कम्युनिस्ट अपना दावा ठोकते हैं... फिर तो ये कम्युनिस्ट हुए...’
मैंने हँसते हुए जोड़ा.
मुझे
तो जैसे दौरा पड़ गया था. मैंने चुन-चुन कर सब्ज़िओं और फलों को हिन्दू, मुसलमान,
क्रिश्च्चन, शांति दूत, दलबदलू क्या कुछ नहीं बना डाला! अगर सब्ज़िओं को पता चल जाता
कि मैं उनके बारे में क्या बातें कर रही हूँ और उनके लिए क्या तय कर रही हूँ तो वे आपस में लड़-कट मरतीं कि नहीं ये तो नहीं
मालूम, पर मुझसे तो ज़रूर लड़ बैठतीं!
घर
के अन्दर हँसी के अनार फूट रहे थे- कुछ छोटे, कुछ बड़े. ठीक उसी वक़्त रेडिओ ने अपना
रंग इसमें घोला, जिसे सुन हम फिर से हरे-हरे हो गए...
‘हरी
हरी वसुंधरा पे नीला नीला ये गगन
कि
जिस पे बादलों की पालकी उड़ा रहा पवन
दिशाएं
देखो रंगभरी चमक रहीं उमंगभरी
ये
किसने फूल फूल पे किया सिंगार है
ये
कौन चित्रकार है ये कौन चित्रकार ...’
Beautiful and very well said Swati...We pine for those days when there would be no boundaries based on religion, caste or creed..the hope is still there but would it really ever materialize?
ReplyDeleteBeautiful, Swati. The house came alive for me and the laughter of you two, too! lots of love
ReplyDeleteबहुत सुंदर कहती हैं आप।
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