Thursday, October 15, 2015

अच्छे लोग

मैं कभी-कभी सादा पान पराग खा लेती हूँ. तीन दिनों पहले मैंने एक छोटी पुड़िया खरीदी थी. उसे साहिर से छुपाकर खाना चाह रही थी कि उसने देख लिया. उसने पूछा,’ मम्मा क्या है?’
मैंने कोई जवाब नहीं दिया.

उसने फिर से पूछा,’ मम्मा क्या है?’

मैंने कहा, ‘कुछ नहीं. बस ऐसे ही. गंदे लोग इसे खाते हैं.’

उसने फिर से पूछा,’ गंदे लोग इसे खाते हैं?’

मैंने कहा,’ हाँ’.

यह सुनकर साहिर दूसरे कमरे में चला गया. उसे जाते देख मैं इत्मीनान से पान-पराग मुँह में डालने लगी. मैं डाल ही रही थी कि साहिर वापस आ गया. 

उसने देखा और मुस्कुरा कर कहा, ‘कभी- कभी अच्छे लोग भी खाते हैं न मम्मा!’

साहिर  के लिए मैं अच्छे लोगों में हूँ यह जानकार उस दिन दिल को बड़ी तसल्ली हुई. लेकिन “अच्छे लोग” ने जाने कैसे तार छेड़ दिए.

चलिए थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं.

मेरे बचपन में मेरे आस पास कुछ ऐसे लोग थे जो ‘पान बहार’ और पान के शौक़ीन थे. एक तो मेरे नानाजी थे जिनके पास ‘पान बहार’ का डब्बा हुआ करता था. छोटी पीली चमची के साथ ‘ पान बहार’ का डब्बा हर वक़्त उनके टेबल पर रहता था. आख़िर नानाजी लिखते-लिखते क्या खाते हैं यह जानने के लिए मैंने एक बार चुपके से डब्बा खोला था. आह! ख़ुशबू तो मेरे नाक में बस गई थी! मैंने 3-4 दाना निकाल कर खाया भी था. एक बार सबके सामने माँगने की हिम्मत कर बैठी. खूब डांट पड़ी थी. मुझे बताया गया कि यह एक गंदी बात है! उसके बाद माँगती नहीं थी, चुपके से ही सही, अपना हक़ समझ कर खा लेती थी. और ऐसा तब होता जब हम 3-4 महीने में नानाजी के पास जाते.

दूसरी, रिश्ते में एक फूआ थीं जिनके पास पनबट्टा हुआ करता था. वहाँ से पान और सुपारी खाना आसान था. जब वे मुझे हसरत भरी नज़र से अपने पनबट्टे को देखता हुआ पातीं तो पूछ ही डालती थीं—‘खैबहीं?’ मेरी आँखों में चमक देख थोड़ा मुझे भी देती थीं. बाद में उनकी छोटी बेटी से मेरी गहरी दोस्ती हुई क्योंकि वो मुझे बिना मांगे ही प्रसाद दे देती थी. मगर इनके यहाँ जाना ही कितना होता था!

कहते हैं न मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की. मेरा कुछ ऐसा ही हाल था.

बड़े होने पर ये बात समझ में आ गई थी कि लड़के इस चीज़ को दूकान से ख़रीद सकते हैं. लड़कियाँ ना तो छुटपन में ना ही बड़े होने पर इसे पान की दूकान से ख़रीद सकती हैं. मुझे किसी ‘दूत’ का इंतज़ार रहता था जिससे मैं बाज़ार से इसे मंगवा पाऊँ.

बाद में जब real और artificial दुःख से पाला पड़ा तब सब बाड़ टूट गए. तब ख़ुद बाहर निकली और पान-पराग चबाया. धीरे धीरे छिट-पुट दुःख के साथ पान-पराग की आदत जुड़ गई. फिर ऐसा हुआ कि छिट-पुट दुःख भी भाग गए और ‘पान-पराग’ रह गया. आदत छिट-पुट वाली बन गई.  मगर दिमाग़ में वह बात रह गई थी कि यह एक गन्दी बात है.


साहिर ने यह कहकर कि कभी-कभी इसे अच्छे लोग भी खाते हैं बरसों का पाप धो दिया. 
(12.02.2009)

1 comment:

  1. kya badhiya likhti ho tum Swati....bahut achcha laga parhkar

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