Saturday, June 27, 2015

हवा

(साहिर जब पांच साल का था तब उसने ये कविता बनाई थी. उस वक़्त वो लिखना नहीं जानता था. उस दिन ठंडी हवा चल रही थी और पेड़ झूम रहे थे. पेड़ों को देखते हुए साहिर धाराप्रवाह कुछ बोलने लगा. मैंने जल्दी से पास पड़े मंच के रैपर को उठाया और उसपर लिखना शुरू. कविता का क्रम आखिर में टूट गया है. ग़लती मेरी है क्योंकि मैंने उसे वहां टोक दिया था.’ क्या बोले तुम’? साहिर रुका, कोई जवाब उसने नहीं दिया और फिर नए तरह से उसने कविता आगे बढ़ायी.)

हवा (11.08.10)

अच्छी हवा प्यारी हवा
सबको हंसा देती है
हर रोज़ आना अच्छी हवा
अच्छी हवा अच्छी हवा
प्यारी हवा

पेड़ अच्छे होते हैं
सबको कुछ कुछ देते हैं
अच्छे पेड़ प्यारे पेड़
लोगों से प्यार करते हैं
प्यार लेकर लोगों से पेड़ प्यार करते हैं
उल्लू को भी खाना देते हैं
बिल्ली को भी खाना देते हैं

प्यार करने वाले आदमी
प्यार करते रहते हैं हर रोज़
आदमी आदमी आदमी
आदमी को हवा से डर नहीं लगता
आदमी को पेड़ से डर नहीं लगता (यहीं पर मैंने टोका था)

पाउडर लगाओ अच्छे आदमी
खाना खाओ अच्छे आदमी
अच्छा अच्छा अच्छा प्यार होता है
और आदमी को कभी गुस्सा नहीं होना चाहिए
वर्ना God punishment देते हैं
और रोना भी नहीं चाहिए!


2 comments:

  1. Beautiful poem sahir....a child's heart & vision....keep thinking....keep writing..lovely

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  2. Beautiful poem sahir....a child's heart & vision....keep thinking....keep writing..lovely

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