‘आंटी जी! जब हम
बड़ा हो जाएंगें ना त आपका सब्भे काम कर देंगें. झाड़ू कर देंगें, पोछा कर देंगें, बर्तन
धो देंगें, आर कपड़वो धूप में डाल देंगें.
बूझिए ना कि सब्भे काम कर देंगें.’ ये कहते हुए छ साल की साक्षी के चेहरे पर कितनी
ख़ुशी है! उसका चेहरा बता रहा है कि इस बात पर उसे मुझसे शाबाशी की उम्मीद है.
कुल छः साल की उमर और ऐसा सपना! मैं अन्दर से हिल उठी हूँ. मेरी
आँखें उसके चेहरे पर टिकी हैं. मुस्कुराता चेहरा और मोती जैसे चमचमाते दांत!
मैं कहती हूँ, ‘पर पढ़-लिख लोगी तो दूसरे काम भी कर सकती हो.’
सुनते ही उसके चेहरे का रंग उतर गया.
‘हम न पढेंगें.’ उसने बहुत साफ़-साफ़ बता दिया.
‘क्यों?’
हमारी बात-चीत सुन तब तक उसकी माँ आ चुकी थी. नाराज़गी जताती
हुई बोली, ‘ ए दीदी! तनिको न पढ़े के चाहती है. केतना तो मारो खाई है लेकिन फिर भी
पढ़े के न चाहती है. आदित्य भले अभी ठीक से न बोलता है लेकिन अपने से क’ लिख लेता
है. एकरा के ‘क’ लिखाते-लिखाते मर गए, लिखबे न करती है दीदी. ‘क’ लिखेगी तब न ‘क’
से कबूतर बोलेगी.’ इस बात पर उसने मेरी सहमती चाही.
पूरी बातचीत का निचोड़ यही निकला कि मैं इन दोनों बच्चों को
पढ़ाने के लिए तैयार हो गई. माँ ने पहले ही बता दिया कि साक्षी पर विशेष ध्यान देने
की ज़रुरत है.
साक्षी के पास क़िस्से बहुत हैं. आप सुनें न सुनें वो क़िस्से सुनाती जाती है--- उंगलियाँ
चटखाते हुए, हथेलियों को नचाते हुए...! चेहरे के भाव तो पल भर में ऐसे बदलती है कि
सिनेमा देखने हॉल में जाने की ज़रूरत नहीं.
कॉपी और पेंसिल के साथ हमारा पहला दिन था. दोनों बच्चे जी
भर के झगड़ चुके थे. बड़ों की फटकार पा चुके थे और अब गंभीर माहौल में पढ़ने को तैयार
थे – सादी कॉपी और काला रंग उड़ेलने वाली पेंसिल के साथ.
‘आज हमलोग कॉपी पर पेंसिल को नचाएंगें.’ मैंने ख़ुश होकर
पेंसिल दिखाई. दोनों बच्चे कुछ देर तक कॉपी पर पेंसिल नचाते रहे. थोड़ी देर बाद आदित्य
घर में घूम-ढूंढ कर रंगीन पेंसिल ले आया
और अब रंगीन पेंसिल के साथ कॉपी रंग रहा था. साक्षी हैरान-परेशान सी वहीं टिकी हुई
थी. हर बार पेंसिल नचाने के बाद वह मुँह से हवा छोड़ रही थी. मानो पत्थर तोड़ने का
काम कर रही हो.
उसकी हालत देखने-समझने के बाद भी मैं पढ़ाने के पुराने
तरीक़ों के साथ अटकी हुई थी.
मैंने कहा, ‘ चलो
साक्षी अब हमलोग इससे एक गोला बनाएंगें.’
यह सुनकर हर वक़्त किसी न किसी भाव से भरा रहनेवाला उसका
चेहरा भावशून्य हो गया. मैंने फिर से कहा, ‘गोला बनाएंगें, गोल-गोल गोला...’
फिर से वही भाव.
मैंने उदाहरण बदला, ‘चलो चूड़ी बनाते हैं. चूड़ी, गोल-गोल
चूड़ी.’
साक्षी अब अपने हाथ की चूड़ियों को निकालने लगी.
‘हाँ! देखो यही है गोल-गोल चूड़ी.’ मैंने ख़ुश होकर कहा. ‘और
बताओ क्या है गोल गोल?’
Blank expression.
मेरे चेहरे की खुशियों की लकीरें ग़ायब होने लग गईं. मैंने थोड़ी
कड़क आवाज़ में पूछा, ’और कुछ है गोल?’
कड़क आवाज़ ने काम किया.उसने हड़बड़ा कर जवाब दिया, ‘सब्भे कुछ गोल है.’
‘जैसे नाम बताओ.’
‘आंटी जी हम अपना नाम बताएं?’ उसने घबराकर पूछा.
‘नहीं साक्षी और कोई चीज़ जो तुम्हारी चूड़ी की तरह गोल है?’
मैंने नरम होकर पूछा.
कोई जवाब नहीं.
‘अच्छा बताओ तो रोटी कैसा होता है?’
‘अच्छा होता है. कहिओ-कहिओ जल भी जाता है.’
‘तो चलो, यहाँ रोटी बनाते हैं.’
साक्षी ने अपनी कॉपी में रोटी बनाई.
‘अरे वाह! ये तो बड़ी अच्छी रोटी बनाई तुमने. चलो अब एक जली
हुई रोटी बनाते हैं.’ मैंने काम आगे बढ़ाने के मक़सद से कहा.
साक्षी ने टेढ़े मेढ़े गोले के बीच में एक छोटा सा गोला बना
दिया. मैं कुछ आगे कहती कि उसने क़िस्सा सुनाना शुरू कर दिया, ’पापा कल्हे मुर्गा
लाए थे. ममी रोटी बनाई. का हुआ कि रोटी जर गिया.’ उसने ताली बजाते हुए कहा.
‘कैसे जल गई रोटी?’ मैंने भी ताली बजाते हुए पूछा.
‘अपने-अपने जर जाता है...’ उसने मोती जैसे दांत चमकाते दिखाते
हुए कहा. आज की पढ़ाई उसके लिए यहीं तक थी. अब वो और क़िस्से सुनाने लगी.
‘आंटी जी, बउओ (बउआ) को बुखार हो गया था. मोम्मी काम पे चल
गई थी. हमको बोल के गई बउओ को देखते रहना. हम अइसा देखे ना कि देखते-देखते बउओ के
होठ से लोर (लार) टपक गया, मोम्मी आई तब दावा पिलाई... मोम्मी काम पे चल जाती है त
हम सब्भे काम कर देते हैं. कपड़वो सरिया देते हैं...’ कितने सारे भाव उसके चेहरे पर
पल भर में आ गए थे—मैं उन सारे भावों को कोशिश करके थोड़ा बहुत पढ़ लेती हूँ पर उसके
लिए कुछ कर नहीं पाती.
आनेवाले दिनों में हम थोड़ा पढ़े, थोड़ा खेले. पढ़ाई-लिखाई के
अलावा वह सब कुछ करने को आतुर रहती. मैंने ये समझ लिया कि ‘धीरे धीरे रे मना धीरे
सब कुछ होए...’
आज शाम उससे पहले उसकी पायल की आवाज़ पहुंची. कमरे में
घुसने से पहले उसने दो बार अपनी पायल को थाप देकर सबको बता दिया कि उसकी नई पायल
आई है. हमेशा की तरह अपनी दाहिनी हथेली को नचाती हुई बोली, ‘हम ‘क’ लिखना सीख लिए
हैं.’
मैंने पूछा , ’क से कउआ वाला ‘क’?’
‘नहीं क से कउआ नहीं होता है. ‘क’ से कबूत्तर होता है, हम
सीख लिए हैं.’ खनकती आवाज़ में वह बोली. उसकी
आवाज़ में ख़ुशी थी और जीत की भावना भी.
उसकी ख़ुशी से मैं ख़ुश तो हूँ पर कहीं यह अहसास भी मन में है
कि उसकी सहज अभिव्यक्ति को भाषाई ब्राह्मणवाद ने जकड़ना शुरू कर दिया है जो ‘क से
कबूतर’, ‘आ से आर्य’ और ‘क्ष से क्षत्रिय’ की सत्ता बनाए रखना चाहता है और उसमें ‘क
से कउआ’ या ‘क्ष से क्षमा’ की कोई जगह नहीं है!