Saturday, February 8, 2020

मम्मा यार

"मम्मा ज़रा बाहर गईं हैं। आप बैठिए न। बस वो आती ही होंगी।" चेहरे पर मुस्कुराहट लिए वो बोल रही है।

"किसी और को भी आना था। वो भी नहीं आई। मम्मा को आने में अगर देर है तो बाद में मिलती हूँ।" मैं कहती हूँ।

"आंटी! मैं आपको क्या बताऊँ! मम्मा को मेरे लिए भी टाइम नहीं है। मैं इत्ते दिन बाद आई हूँ, कहती हूँ मम्मा यार ज़रा मेरे पास भी बैठो, पर नहीं! उसके पास इतने काम हैं कि क्या बताऊँ! मुझे तो पता ही नहीं था कि उसने यहाँ नीचे लड़कियों को पढ़ाने का काम भी शुरू कर दिया है। उसके अलावा भी हज़ार काम हैं। दिन भर तो वो पकड़ में ही नहीं आती। शाम को किचन में होती है। मैं बोलती रहती हूँ, मम्मा यार! आज दिन भर जो हुआ ज़रा सुन तो लो। आपको पता है finally वो रात में आती है। बिस्तर पर लेटती है और कहती है, हाँ! अब बोल। मैं बोलना शुरू करती हूँ.... दो मिनट बाद वो अपने पैर सीधे करके कहती है, ज़रा पैर तो टीप दे। तो मैं बोलते-बोलते पैर टीपने लगती हूँ और मम्मा सो जाती है।" वो हँसते हँसते शिकायत कर रही है। कितना दुलार है उसकी आँखों में!

5-10 मिनट में ही उसकी मम्मा पहुँच जाती है। बेटी को देखते ही पूछती है, "ये तुम ऐसे ही चली गई थी?"

"मम्मा यार! आपको पता है आज मैं पढ़ाने गई थी।लड़कियों ने कहा कि मैं कल भी आऊँ।" बेटी ने प्रश्न का जवाब कुछ ऐसे दिया है। उसका चेहरा चमक रहा है।

"तुमने स्वेटर नहीं पहना था?" माँ के स्वर में चिंता है।

"मम्मा यार! ये रहा। अभी तो घर में आने के बाद उतारा है।" कितने प्यार से वो बता रही है। माँ की चिंता ग़ायब और चेहरा खिल गया है। अब दोनों यारों की तरह बातें कर रही हैं।

मेरा दिल 'मम्मा यार' पर अटक गया है। ' मम्मा यार' पहले भी सुना है। पर ये 'मम्मा यार' तो सीधा दिल में उतरता जा रहा है। दिल में आया कि  माँ को फ़ोन करूं और उसे भी इसी संबोधन से पुकारूँ। पर माँ की संभावित प्रतिक्रिया सोच हँसी आ गई और ये ख़याल ख़याल ही रहने दिया।

लगता है जैसे इस 'मम्मा यार' के इश्क़ में पड़ गई हूँ यार!

Saturday, May 25, 2019

मन सूफ़ी



“सूफ़ी आउट हो गयी है… वो तो चीटिंग कर रही थी… भइया भी आउट हो गया है… अब हम रेस में जीत जाएंगें।” इंशा अपनी बड़ी-बड़ी आँखों को और बड़ा बनाकर कहती है। छोटी बहन की बात पर सूफ़ी हँसती है। कितनी मुलायम और नरम है उसकी हँसी! वो इंशा से कुछ कहती नहीं बस उसे खाना जल्दी ख़त्म करने की रेस में जीतने देती है।

“सुनो! तुम दिवाली में यहाँ आओगी ना तब हमलोग साथ में चकरी (चर्खी) छोड़ेंगे…” बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि माँ ‘आप’ कहने को कहती है। वो अपनी बात फिर से शुरू करती है, “सुनिए! आप जब आइएगा ना… आओगी ना तुम…”

उसकी बात पर हम एकसाथ खिलखिलाते हैं। मैं उसके नाम का मतलब उससे पूछने से अपने आप को रोक नहीं पाती, पूछ बैठती हूँ, “तुम्हारे नाम का मतलब क्या है इंशा?”

“इसका मतलब होता है भगवान् जी की मर्ज़ी… और ये उर्दू होता है।” जैसे आधा मतलब वो समझ रही हो और आधा समझने की कोशिश कर रही हो

“भगवान् जी उर्दू होता है?’

“नहीं, इसका मतलब उर्दू होता है।” उसके चेहरे पर ऐसा भाव है मानो अब और कुछ पूछना हो तो पापा से पूछना। इंशा ने जल्दी से खाना खा लिया है और अब हम सब उसके हुकुम का इंतज़ार कर रहे हैं। 'इधर चलो ना' कहती हुई हाथ पकड़ वो दूसरे कमरे में ले जाती है।

कमरे में तबला है। “इत्ता बड़ा तबला! ये कौन बजाता है?” मैं भी आँखें बड़ी कर पूछती हूँ।

“ये तो हम बजाते हैं… देखो ऐसे बजता है ये… धा धिन धिन धा…” वो अपनी छोटी-छोटी उँगलियों से तबले पर थाप दे रही है। “और जोर से बजाएंगें ना तो बहुत दुखने लगता है…” वो अपनी उँगलियों को झटक कर कहती है। “हम रोज प्रैटिक्स करते हैं…सूफ़ी भी करती है, वो तो वायलिन बजाती है भइया नहीं करता है गिटार प्रैटिक्स?” दरअसल वो प्रैक्टिस कह रही थी “तुम उसको मेरे पास ले आना। हम उसको भी प्रैटिक्स करा देंगे।” वो पूरी संजीदगी से कहती है।
आठवीं में पढ़ने वाले भइया जी और पाँचवीं में पढ़ने वाली सूफ़ी केजी क्लास में पढ़ने वाली इंशा की इस बात पर हँसी के फव्वारे छोड़ते हैं।

अब हम सबको कैरम खेलना है क्योंकि इंशा ऐसा चाहती है। पापा और सूफ़ी एक तरफ़, इंशा और भइया एक तरफ़। सूफ़ी के हाथ से कई गोटी पिलने से चूक रही है। वो हर बार यही कहती हुई नरम हँसी हँस पड़ती है, “एक बार फिर छूट गया… लो, एक बार फिर छूट गया।”

“सूफ़ी तुम बिल्कुल सूफ़ी जैसी हो। ऐसी कैसे हो तुम?” मैं उसे देख भाव-विभोर हो रही हूँ।

सूफ़ी कहती नहीं कुछ। अपने पापा को देख मुस्कुराती है। पापा से खूब छनती है उसकी। घर में घुसते ही एक बड़ी सी तस्वीर कमरे की बाईं दीवार पर दिखती है। पापा के पेट पर नन्ही सूफ़ी सोई हुई है। और पापा उतने ही  इत्मीनान से उसे पकड़ कर सो रहे हैं।

वही भाव अभी भी उसके चेहरे पर तैरता रहता है… इत्मीनान, सुकून, मुहब्बत!

लोग अक्सर उससे पूछते हैं, “तुम्हारे माँ-बाप हिन्दू हैं फिर उन्होंने तुम्हारा ऐसा अजीब सा नाम कैसे रख दिया, सूफ़ी कुमार? ये कैसा नाम है?” कोई पूछता, “सूफ़ी’ तो मुसलमान हुआ ना और ‘कुमार’ हिंदू। तुम्हारा नाम तो न हिंदू हुआ न मुसलमान!” कुछ यह सोचकर परेशान रहते कि “तुम हिन्दू हुई कि मुसलमान?”

मैं सोचने लगी कि इस नन्ही सी जान ने क्या जवाब दिया होगा! मैंने उससे पूछा, “फिर तुम क्या कहती हो?” 

नरम मुस्कान के साथ उसका जवाब आया, “मैं कहती हूँ, ‘अजीब कैसे? मुझे तो मेरा नाम बहुत पसंद है।"

अभी भी उसका चेहरा बिल्कुल शांत है पर आँखें मानो पूछ रही हों, 'मेरा नाम मुझे पसंद है। इंशा को पसंद है। मम्मी -पापा को पसंद है । फिर दूसरे लोग परेशान क्यों हो जाते हैं?'




Wednesday, June 27, 2018

प्रकाश के मोती



आज लाइब्रेरी  में पहले पहेलियों का खेल चला. मैंने जाते ही बता दिया कि मेरी याद्दाश्त बहुत ख़राब है इसलिए मैं पहेलियाँ किताब से पढ़कर पूछूंगी और बच्चे वो पहेलियाँ पूछें जो उन्हें याद हो. बच्चे तैयार हो गए. सो मैं किताब से पूछती और बच्चे अपनी याद से. नौवीं क्लास में पढ़ने वाले गौरव ने maths वाली कई पहेलियाँ पूछीं जिनसे मेरा सर चक्कर खा गया. हालांकि बच्चों में कुछ ही बच्चे जवाब दे पा रहे थे मगर हर किसी को बहुत मज़ा आ रहा था. ज़्यादातर लड़कियां चुप थी, कोई पहेली पूछ नहीं रही थीं, हाँ जवाब ज़रूर दे रही थीं.... शायद मन ही मन में सोच रही हों, ‘बच्चू, अगली बार मेरा कमाल देखना.’

लगभग आधे घंटे के बाद हम कहानियों पर लौटे... कहानी की किताबों पर... मैंने घेरे के बीच कई किताबें रखीं और उन्हें रोचक शीर्षक वाली किताब उठाने को कहा. चूँकि आज पहले  ही कई गतिविधियां हो चुकी थीं, म्यूजिक क्लास भी कुछ ही देर पहले ख़त्म हुई थी...बच्चे बहुत ज़्यादा पढ़ने के मूड में नहीं थे. सो सब एक-एक किताब पढ़ कर सटक लिए.

दस बरस का प्रकाश अब भी मेरे पास बैठा था. मुस्कुरा-मुस्कुरा कर वो किताबें उठाता, पढ़ता और किताब वापस रख देता. ये हमारी पहली मुलाक़ात थी और मैंने उसे ‘शरीफ़’ बच्चा समझ लिया था. यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि दूसरी ही मुलाक़ात में उसने अपने सभी शरारती तत्वों का प्रदर्शन कर दिया था... पढ़ने के समय मन बहलावन हेतु दोस्तों के साथ बन्दरघुलाटी, शिकायतबाज़ी, खो-खो, खी-खी, डांटम-डपटम...वगैरह वगैरह.

अभी वो बड़ी गंभीरता से मेरी किताबों को उलट-पलट कर देख रहा था. मैंने जब पूछा कि अंग्रेज़ी भी पढ़ते हो, उसने एक किताब उठाई और मुझे सुनाने लगा,’ माई लिटिल बुक ऑफ काउंटिंग’. वो ख़ुद से ही पढ़ रहा था, मुझे कहीं बताने की ज़रुरत नहीं पड़ रही थी.  मेरी दूसरी तरफ़ साहिर था जो ‘Tell Me Why’ में खोया था. छुट्टियों में जो बच्चा बिना टीवी और मोबाइल के नहीं रहना चाहता वो दो घंटे से लाइब्रेरी में बच्चों के साथ बिलकुल ही अलग रूप में था. पढ़ वो रहा था और उसका असर मेरे ऊपर हो रहा था!

प्रकाश एक के बाद एक कहानी सुनाता जा रहा था – चाय, मीठे मीठे गुलगुले, तबला! वहाँ कई किताबें ऐसी थीं जिनमें शब्दों की मात्रा बहुत ज़्यादा थी और शब्दों के आकार भी बहुत छोटे थे. वो उन किताबों को उलट-पुलट कर कोई अपने लायक किताब ढूंढ रहा था. एकदम नीचे ‘छुटकी उल्ली’ रखी थी. मैंने उसे निकालकर दी. उसने ज़ोर-ज़ोर से पढना शुरू किया, बिना किसी रुकावट के.

कहानी एक छुटकी उल्ली की है जो अपनी अम्मी से बहुत सवाल करती है. कभी तारों के बारे में, कभी लहरों के बारे में कभी आसमान की ऊँचाई के बारे में... उसकी अम्मी उससे कभी कहती “जाओ जाकर गिन लो,” तो कभी  “जाओ जाकर देख लो.” छुटकी हर बार कोशिश करती है. मगर कभी वो तारे गिनते-गिनते थक कर सो जाती है तो कभी आसमान की ऊँचाई नापने के लिए उड़ान भरते-भरते चूर होकर लौट आती है.

एक दिन अपनी अम्मी के गले लगकर छुटकी कहती है, ’अम्मी, मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ.’

अम्मी मुस्कुराकर पूछती है, ‘कितना?’ तब वो कहती है, ’जितना ऊँचा आसमान, उतना.’

अम्मी ने उसे अपने सीने से चिपका लिया. तब छुटकी पूछ्ती है, ‘तुम मुझे इस तरह कितनी बार गले लगाओगी?’

अम्मी कहती है, ’जितने तारे आसमान में, समंदर में  जितनी लहरें... उतनी बार.’

कहानी यहीं पर ख़त्म हो गई. प्रकाश एकदम चुप था. किताब हाथों में, नज़रें किताब पर ठहरी थीं. मैं थोड़ा हैरान हो रही थी. मुझे अजीब भी लग रहा था कि अभी तक तो एक कहानी के ख़त्म होते ही दूसरी शुरू कर दे रहा था और अब एकदम कैसे चुप...! कुछ तो कहता, अच्छा- बुरा कुछ तो बताता . ’छुटकी उल्ली’ मेरी पसंदीदा कहानियों में से एक है. ऐसे में प्रकाश का चुप रहना भी मुझे परेशान कर रहा था.

‘क्या हुआ? कहानी अच्छी नहीं लगी?’ अपने भावों को नियंत्रित करते हुए मैंने पूछा.

उसने जवाब नहीं दिया. बस टकटकी लगाए किताब देखता रहा.

मैं बैचैन थी ये जानने को कि उसके मन में क्या है? मैंने फिर से पूछा, ’अरेsss क्या हुआ?’

इस बार उसने अपनी भरी हुई आँखें ऊपर कीं और धीरे से मुस्कुराकर बोला, ‘बहुत अच्छी है... मैsम!’  अब वो फिर से उस किताब को उलटने-पलटने लग गया.


Wednesday, May 23, 2018

चक्कर-घुलाटी



‘अम्मा, पुंलिंग के साथ स्त्रीलिंग क्यों होता है? इसके साथ तो कुछ और होना चाहिए .’

‘क्या होना चाहिए?’

‘Pulling के साथ तो Pushing होना चाहिए न!’


अम्मा तब से चक्कर-घुलाटी खा रही है... और बेटा बंदर-घुलाटी!!!

Monday, April 16, 2018

जिगर का टुकड़ा


‘फ़िल्ज़ा’ नाम कितना सुन्दर है!  मतलब और भी सुंदर- ‘जिगर का टुकड़ा’. अभी साढ़े तीन साल से उसे जानती हूँ यानी जब वो पैदा हुई है तब से और उसके बाबा को उससे भी पाँच साल पहले से.

मुझे याद है फ़िल्ज़ा होनेवाली थी. आख़िरी महीने में डॉक्टर ने बताया कि कोई complication है.  बाबा जहाँ थे वहीँ से अम्मा के पास उलटे पाँव भागे थे. मैंने यूँ ही फ़ोन किया था हाल-चाल लेने, तो पता चला ऐसी बात है. वे तब ट्रेन में थे. अमूमन ठहाके पे ठहाका लगाने वाले बाबा आज बैचैन और घबराए हुए थे. मगर एक रोज़ बाद ही खिलखिलाते हुए उनका फ़ोन आया, ‘हाँsss जी! बेटी हुई है. सब, सब ठीक है.’

बेटी ही तो चाहते थे वे! अल्लाह मियाँ ने उनकी ये बात सुन ली थी!

फ़िल्ज़ा की कहानियाँ मन में तब से बैठी हैं जब से उसने बोलना शुरू किया.

पहला  क़िस्सा तब का याद है, तब वो दो-ढ़ाई साल की रही होगी. पूरा परिवार हमारे यहाँ दावत पर आया था. खाने में, किसी चीज़ में नमक कम था.

मैंने कहा, ’नमक लाना होगा’.

 फ़िल्ज़ा बोली, ‘नईं ममक.’

मैं हँसी और बोली, ‘नईं नमक.’

वो भी हँसी और बोली, ‘नईंsss ममक.’

दो –तीन बार ऐसे ही हुआ. मैं नमक और वो ममक. कितने विश्वास से वो ‘ममक’ कह रही थी. बीच-बीच में हँसती भी थी लेकिन ‘साधुपन’ के साथ. मैं सोचने को मजबूर हो गई- कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे पूर्वजों के एक दल-बल ने नमक को ‘ममक’ नाम दिया हो और फ़िल्ज़ा उन्हीं की वक़ालत करने आई हो!

ज़्यादा दोस्ती उसकी बाबा से है. हाँ, एक बात में अम्मा से बहुत दोस्ती है—बाबा गोश्त नहीं खाते अम्मा खाती हैं. सो खाने के वक़्त उसकी दौड़ अम्मा की ओर लगती है. खाने में अगर गोश्त हो तो उस वक़्त उसकी अम्मा दुनिया की सबसे प्यारी अम्मा होती हैं और ये हमें उसकी मटकती कमर को देख कर मालूम चलता है. घर में मटन पक रहा था. उसकी खुशबू उसे किचन तक खींच लाई. मगर सिर्फ़ खुशबू से कैसे पता चले कि असल में है क्या! सो अम्मा की गोद में चढ़ लगी कूकर में झांकने. और जो देखा कि सच में माल-मसाला वही है तो गोद से ऐसे उछली कि हम सबने बड़ी मुश्किल से उसे कूकर में गिरने से बचाया.

एक बार हमसब एक शादी में जा रहे थे. हम औरतें गाड़ी में पीछे बैठी थीं. फ़िल्ज़ा के बाबा गाड़ी चला रहे थे. फ़िल्ज़ा उनकी सीट के ठीक पीछे खड़ी थी. ‘नईं तुम हियाँ बेठो. तुम उधर बेठो’ जैसे instruction देने के बाद दो सीटों के बीच की जगह में उसका कमर मटकाना शुरू हुआ.

हम बड़ों के पास अलग तरह की बातें थीं—ट्रेन, गुमटी, ट्राफिक, किसी का धोखेबाज़ होना, पैसा हड़प लेना, हमारा ऐसा समझना, उसका वैसा समझना..वगैरह वगैरह. फ़िल्ज़ा की नज़र गाड़ियों और रौशनी पर थी. बीच में कभी अम्मा ने ज़रा कड़क होकर ‘फ़िल्ज़ा हाथ गाड़ी के अंदर करो’ कहा और फ़िल्ज़ा एकदम अपने बाबा की तर्ज पर ठहाकेदार अंदाज़ में हँसने लगी. फिर एक हँसी का गुबार उठा और हम सब हँसने लगे थे.

गुमटी पर गाड़ी 10-15 मिनट खड़ी रही होगी. फिर जब फ़र्राटे से गाड़ी आगे बढ़ी तब फ़िल्ज़ा ने बाबा की सीट को पीछे से कस कर पकड़ा और मुस्कुराती हुई बोली,’ हम तुमको देख रहे हैं, बाबा. हम तुमको देख रहे हैं.’

बाबा भी मुस्कुराए और बोले, ‘हम भी तुमको देख रहे हैं बाबू,’

ये खेल चलता रहा. कभी बाबा गाड़ी में लगे शीशे में फ़िल्ज़ा को देखते और फ़िल्ज़ा बाबा को...

मैं देख रही थी!

यहाँ अब घर पर सबसे उसकी दोस्ती हो गयी है. जब आती है तो एक जगह सिमट कर नहीं बैठती पूरे घर में भागती- फिरती है. और जब थक जाए तो अपने बाबा की गोद को आरामकुर्सी बना लेती है.

उस बार बलून से ‘डुम-डुम’ खेलते-खेलते उसने गोल-गोल चक्कर लगाया और फिर बाबा की गोद में बैठ गई. पहले तो बाबा उसे अपनी गोद में भरकर ‘उहूँ उहूँ sss’ की आवाज़ निकालते रहे. फिर बहुत दुलार से उसे अपनी गोद में भरकर पूछा, ‘तुम किसकी बेटी हो फ़िल्ज़ा?’ गोद में बैठी उसने चेहरा बाबा की ओर घुमाआ और बोली, ‘हम तुमरी बेटी हैं बाबा.’ मेरे दिल से दुआ बरसने लगी- कभी... कभी किसी की नज़र ना लगे. जी में आया मैं भी अपने पापा को फ़ोन करूँ और कहूँ, ‘हम तुमरी बेटी हैं पापा.’ फ़ोन तो किया नहीं मगर इस बाबा-बेटी के दुलार में खो-सी गई.

ध्यान भंग तब हुआ जब बाबा ने पूछा, ‘आपने वो लोरी सुनी है- ए चंदा मामा , आरे आव,पारे आव...’

‘नहीं..कौन सा गाना है?’ मैंने कहा.

‘इतना शानदार गाना आपने सुना ही नहीं है...you tube पर सुनिएगा.’ उन्होंने कहा. अपनी आवाज़ और सुर का अंदाज़ा उन्हें था सो उन्होंने गुनगुनाने तक की कोशिश नहीं की, सीधा you tube पर गाना सुना दिया.

‘ए चंदा मामा आरे आव पारे आव
नदिया किनारे आव
सोना के कटोरिया में दूध भात लेले आव
बबुआ के मुहंवा में घुटूप....’

सारे के सारे बचपन में पहुँच गए थे. एकदम फ़िल्ज़ा की उमर में... वहीँ जहाँ हम सब जिगर का टुकड़ा होते हैं!



Friday, March 30, 2018

तनिको न बदललइ



‘ममी गे आंटी आ गेलइ?’

‘हाँ गे!’

‘कईसन हई?’

‘निम्मन हई.’

‘आंटी के चेहरवा बदल गेलइ कि ओइसने हई?’

‘न गे! चेहरवा बदल कइसे जतई? दूइए दिन ला त गेल रहलई आंटी. बदल कईसे जतई? ओइसने हई. चलिहे न सांझ के त अपने देख लिहे.’

स्कर्ट टॉप पर पायल बजाती और अपने बॉय कट बाल पर हाथ फेरती सात साल की साक्षी मुझे दरवाज़े की ओट से देख रही है. कुछ ही मिनटों में ताली बजाती कमरे में अन्दर दौड़ी.

‘ममी गे! आंटी तन्निको न बदललई. ओइसने त हई आंटी जइसे पहिले रहलइ.’ ये बताती हुई वो कितनी ख़ुश है!

सभी हँस रहे हैं. मैंने भी ठहाका लगाया और पूछा, ‘मेरा चेहरा दो दिन में कैसे बदल जाता साक्षी?’

मुस्कुराती हुई, उंगलियाँ पुटकाती हुई वह बोली, ‘हमको बुझाया न आंटी जी कि बाहर जाने पर सब्भे कोई बदल जाता है.’

मैंने पूछा, ‘जैसे कौन बदल गया?’

‘सत्यमवा अप्पन नानी लंग गिया था. जाए घड़ी एत्ती चुके था. हमनी सब के गोदी चढ़ता था. ओ लंग से आया न त बुले लगा था. आ ओकर चेहरवो बदल गेल था. ओही से हमको बुझाया न कि कहीं आप हों न बदल गेल होइए!’ उसने भेद की बात बताई.

हम सब मिल के हँस रहे थे. और साक्षी पायल बजाती हुई  ‘डैन्स’ कर रही थी. अपने टूटे दांत दिखाती ये भी कहती जा रही थी, ‘ओइसने त हई आंटी... तनिको  न बदललइ!’





Saturday, November 18, 2017

सब्भे कुछ गोल है


‘आंटी जी!  जब हम बड़ा हो जाएंगें ना त आपका सब्भे काम कर देंगें. झाड़ू कर देंगें, पोछा कर देंगें, बर्तन धो देंगें, आर कपड़वो धूप  में डाल देंगें. बूझिए ना कि सब्भे काम कर देंगें.’ ये कहते हुए छ साल की साक्षी के चेहरे पर कितनी ख़ुशी है! उसका चेहरा बता रहा है कि इस बात पर उसे मुझसे शाबाशी की उम्मीद है.

कुल छः साल की उमर और ऐसा सपना! मैं अन्दर से हिल उठी हूँ. मेरी आँखें उसके चेहरे पर टिकी हैं. मुस्कुराता चेहरा और मोती जैसे चमचमाते दांत!

मैं कहती हूँ, ‘पर पढ़-लिख लोगी तो दूसरे काम भी कर सकती हो.’ सुनते ही उसके चेहरे का रंग उतर गया.

‘हम न पढेंगें.’ उसने बहुत साफ़-साफ़ बता दिया.

‘क्यों?’

हमारी बात-चीत सुन तब तक उसकी माँ आ चुकी थी. नाराज़गी जताती हुई बोली, ‘ ए दीदी! तनिको न पढ़े के चाहती है. केतना तो मारो खाई है लेकिन फिर भी पढ़े के न चाहती है. आदित्य भले अभी ठीक से न बोलता है लेकिन अपने से क’ लिख लेता है. एकरा के ‘क’ लिखाते-लिखाते मर गए, लिखबे न करती है दीदी. ‘क’ लिखेगी तब न ‘क’ से कबूतर बोलेगी.’ इस बात पर उसने मेरी सहमती चाही.


पूरी बातचीत का निचोड़ यही निकला कि मैं इन दोनों बच्चों को पढ़ाने के लिए तैयार हो गई. माँ ने पहले ही बता दिया कि साक्षी पर विशेष ध्यान देने की ज़रुरत है.

साक्षी के पास क़िस्से बहुत हैं. आप सुनें  न सुनें वो क़िस्से सुनाती जाती है--- उंगलियाँ चटखाते हुए,  हथेलियों को नचाते हुए...! चेहरे के भाव तो पल भर में ऐसे बदलती है कि सिनेमा देखने हॉल में जाने की ज़रूरत नहीं.

कॉपी और पेंसिल के साथ हमारा पहला दिन था. दोनों बच्चे जी भर के झगड़ चुके थे. बड़ों की फटकार पा चुके थे और अब गंभीर माहौल में पढ़ने को तैयार थे – सादी कॉपी और काला रंग उड़ेलने वाली पेंसिल के साथ.

‘आज हमलोग कॉपी पर पेंसिल को नचाएंगें.’ मैंने ख़ुश होकर पेंसिल दिखाई. दोनों बच्चे कुछ देर तक कॉपी पर पेंसिल नचाते रहे. थोड़ी देर बाद आदित्य घर में घूम-ढूंढ  कर रंगीन पेंसिल ले आया और अब रंगीन पेंसिल के साथ कॉपी रंग रहा था. साक्षी हैरान-परेशान सी वहीं टिकी हुई थी. हर बार पेंसिल नचाने के बाद वह मुँह से हवा छोड़ रही थी. मानो पत्थर तोड़ने का काम कर रही हो.

उसकी हालत देखने-समझने के बाद भी मैं पढ़ाने के पुराने तरीक़ों के साथ अटकी हुई थी.

मैंने कहा,  ‘ चलो साक्षी अब हमलोग इससे एक गोला बनाएंगें.’

यह सुनकर हर वक़्त किसी न किसी भाव से भरा रहनेवाला उसका चेहरा भावशून्य हो गया. मैंने फिर से कहा, ‘गोला बनाएंगें, गोल-गोल गोला...’

फिर से वही भाव.

मैंने उदाहरण बदला, ‘चलो चूड़ी बनाते हैं. चूड़ी, गोल-गोल चूड़ी.’

साक्षी अब अपने हाथ की चूड़ियों को निकालने लगी.

‘हाँ! देखो यही है गोल-गोल चूड़ी.’ मैंने ख़ुश होकर कहा. ‘और बताओ क्या है गोल गोल?’

Blank expression.

मेरे चेहरे की खुशियों की लकीरें ग़ायब होने लग गईं. मैंने थोड़ी कड़क आवाज़ में पूछा, ’और कुछ है गोल?’

कड़क आवाज़ ने काम किया.उसने हड़बड़ा कर जवाब दिया, ‘सब्भे कुछ गोल है.’

‘जैसे नाम बताओ.’

‘आंटी जी हम अपना नाम बताएं?’ उसने घबराकर पूछा.

‘नहीं साक्षी और कोई चीज़ जो तुम्हारी चूड़ी की तरह गोल है?’ मैंने नरम होकर पूछा.

कोई जवाब नहीं.

‘अच्छा बताओ तो रोटी कैसा होता है?’

‘अच्छा होता है. कहिओ-कहिओ जल भी जाता है.’

‘तो चलो, यहाँ रोटी बनाते हैं.’

साक्षी ने अपनी कॉपी में रोटी बनाई.

‘अरे वाह! ये तो बड़ी अच्छी रोटी बनाई तुमने. चलो अब एक जली हुई रोटी बनाते हैं.’ मैंने काम आगे बढ़ाने के मक़सद से कहा.

साक्षी ने टेढ़े मेढ़े गोले के बीच में एक छोटा सा गोला बना दिया. मैं कुछ आगे कहती कि उसने क़िस्सा सुनाना शुरू कर दिया, ’पापा कल्हे मुर्गा लाए थे. ममी रोटी बनाई. का हुआ कि रोटी जर गिया.’ उसने ताली बजाते हुए कहा.

‘कैसे जल गई रोटी?’ मैंने भी ताली बजाते हुए पूछा.

‘अपने-अपने जर जाता है...’ उसने मोती जैसे दांत चमकाते दिखाते हुए कहा. आज की पढ़ाई उसके लिए यहीं तक थी. अब वो और क़िस्से सुनाने लगी.

‘आंटी जी, बउओ (बउआ) को बुखार हो गया था. मोम्मी काम पे चल गई थी. हमको बोल के गई बउओ को देखते रहना. हम अइसा देखे ना कि देखते-देखते बउओ के होठ से लोर (लार) टपक गया, मोम्मी आई तब दावा पिलाई... मोम्मी काम पे चल जाती है त हम सब्भे काम कर देते हैं. कपड़वो सरिया देते हैं...’ कितने सारे भाव उसके चेहरे पर पल भर में आ गए थे—मैं उन सारे भावों को कोशिश करके थोड़ा बहुत पढ़ लेती हूँ पर उसके लिए कुछ कर नहीं पाती.

आनेवाले दिनों में हम थोड़ा पढ़े, थोड़ा खेले. पढ़ाई-लिखाई के अलावा वह सब कुछ करने को आतुर रहती. मैंने ये समझ लिया कि ‘धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होए...’

आज शाम उससे पहले उसकी पायल की आवाज़ पहुंची. कमरे में घुसने से पहले उसने दो बार अपनी पायल को थाप देकर सबको बता दिया कि उसकी नई पायल आई है. हमेशा की तरह अपनी दाहिनी हथेली को नचाती हुई बोली, ‘हम ‘क’ लिखना सीख लिए हैं.’

मैंने पूछा , ’क से कउआ वाला ‘क’?’

‘नहीं क से कउआ नहीं होता है. ‘क’ से कबूत्तर होता है, हम सीख लिए हैं.’  खनकती आवाज़ में वह बोली. उसकी आवाज़ में  ख़ुशी थी और जीत की भावना भी.


उसकी ख़ुशी से मैं ख़ुश तो हूँ पर कहीं यह अहसास भी मन में है कि उसकी सहज अभिव्यक्ति को भाषाई ब्राह्मणवाद ने जकड़ना शुरू कर दिया है जो ‘क से कबूतर’, ‘आ से आर्य’ और ‘क्ष से क्षत्रिय’ की सत्ता बनाए रखना चाहता है और उसमें ‘क से कउआ’ या ‘क्ष से क्षमा’ की कोई जगह नहीं है!